भोपाल, 05 अगस्त।
मध्य प्रदेश में लगभग नौ वर्ष बाद छात्रसंघ चुनावों की वापसी होने जा रही है। उच्च न्यायालय में राज्य सरकार द्वारा सितंबर 2026 के पहले दस दिनों में चुनाव कराने का आश्वासन दिए जाने के बाद विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में चुनावी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। वर्षों बाद लाखों विद्यार्थियों को अपने प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिलेगा। यह केवल चुनाव नहीं, बल्कि लोकतंत्र, शिक्षा और भविष्य के नेतृत्व की भी एक महत्वपूर्ण परीक्षा होगी।
छात्रसंघ चुनावों का इतिहास भारत की लोकतांत्रिक यात्रा से गहराई से जुड़ा रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से लेकर जेपी आंदोलन और उसके बाद के दशकों तक विश्वविद्यालय केवल शिक्षा के केंद्र नहीं रहे, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक चेतना के भी प्रमुख मंच बने। देश के अनेक बड़े नेताओं ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से की। मध्य प्रदेश भी इसका अपवाद नहीं है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित अनेक वरिष्ठ नेताओं ने छात्र जीवन में संगठनात्मक और छात्र राजनीति के माध्यम से अपनी पहचान बनाई। यही कारण है कि छात्रसंघ चुनावों को लंबे समय से राजनीति की नर्सरी कहा जाता है।
छात्रसंघ का मूल उद्देश्य राजनीतिक दलों के लिए कार्यकर्ता तैयार करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों का लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। पुस्तकालय, छात्रावास, प्रयोगशालाएं, छात्रवृत्ति, परिवहन, खेल सुविधाएं, सांस्कृतिक गतिविधियां, कैंटीन, फीस और परिसर की अन्य समस्याओं को प्रशासन तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना छात्रसंघ की मूल जिम्मेदारी है।
इसके साथ ही छात्रसंघ युवाओं में नेतृत्व क्षमता, संवाद कौशल, संगठन क्षमता, निर्णय लेने की योग्यता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सम्मान विकसित करता है। यही कारण है कि दुनिया के अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में किसी न किसी रूप में छात्र प्रतिनिधित्व की व्यवस्था मौजूद है।
मध्य प्रदेश में ये चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि प्रदेश में लगभग 70 से 80 विश्वविद्यालय और 2,700 से अधिक महाविद्यालय हैं, जहां लाखों विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। वर्ष 2017 के बाद छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए। इस दौरान कोरोना महामारी और अन्य प्रशासनिक कारणों से चुनाव लगातार टलते रहे। अब लगभग नौ वर्ष बाद चुनावों की वापसी विद्यार्थियों के लिए नई शुरुआत मानी जा रही है।
लेकिन इस बार की चुनौती पहले से कहीं बड़ी है। इतने लंबे अंतराल के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन, पुलिस और उच्च शिक्षा विभाग के सामने शांतिपूर्ण, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की जिम्मेदारी होगी।
वर्ष 2005 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंग्डोह की अध्यक्षता में समिति गठित की गई। समिति का उद्देश्य छात्रसंघ चुनावों में बढ़ते धनबल, बाहुबल, हिंसा और राजनीतिक हस्तक्षेप को नियंत्रित करना था।
समिति ने स्पष्ट सिफारिशें दीं कि उम्मीदवार की न्यूनतम 75 प्रतिशत उपस्थिति हो, गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि न हो, चुनाव खर्च सीमित रहे, बाहरी व्यक्तियों का हस्तक्षेप न हो और पूरी चुनाव प्रक्रिया दस दिनों के भीतर पूरी कराई जाए। इन सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया और आज भी यही छात्रसंघ चुनावों का प्रमुख नियामक ढांचा माना जाता है।
छात्र राजनीति को अक्सर राजनीति की प्रयोगशाला कहा जाता है। इसका कारण स्पष्ट है। विश्वविद्यालयों में ही युवा पहली बार सार्वजनिक भाषण देते हैं, चुनाव लड़ते हैं, संगठन बनाते हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को व्यवहार में समझते हैं।
मध्य प्रदेश की राजनीति में भी अनेक प्रभावशाली नेता छात्र राजनीति से आगे बढ़े। इससे यह साबित होता है कि छात्रसंघ चुनाव केवल कॉलेज तक सीमित प्रक्रिया नहीं, बल्कि भविष्य के नेतृत्व की आधारशिला भी हो सकते हैं।
लेकिन चिंताएं भी कम नहीं हैं। छात्रसंघ चुनावों के साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी जुड़ी रही हैं। देश के विभिन्न राज्यों में समय-समय पर चुनावों के दौरान हिंसा, झड़प, तोड़फोड़, अत्यधिक खर्च और राजनीतिक हस्तक्षेप की घटनाएं सामने आती रही हैं। मध्य प्रदेश में 2006 में उज्जैन के माधव कॉलेज में प्रोफेसर एच.एस. साबरवाल की मृत्यु से जुड़ी घटना आज भी छात्र राजनीति के इतिहास की एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील घटना मानी जाती है। इसने यह सवाल खड़ा किया कि यदि चुनावों पर प्रभावी नियंत्रण न हो, तो शिक्षा का वातावरण प्रभावित हो सकता है।
यही कारण है कि शिक्षाविदों और अभिभावकों का एक वर्ग चाहता है कि चुनाव पूरी तरह नियमों के दायरे में हों और परिसर की शैक्षणिक गरिमा किसी भी स्थिति में प्रभावित न हो।
आज का विद्यार्थी 1990 या 2000 के दशक के छात्र से काफी अलग है। डिजिटल तकनीक, सोशल मीडिया, स्टार्टअप संस्कृति, नवाचार और वैश्विक अवसरों ने युवाओं की सोच को व्यापक बनाया है। आज का छात्र केवल नारेबाजी नहीं, बल्कि रोजगार, कौशल विकास, अनुसंधान, बेहतर शिक्षा, डिजिटल सुविधाएं और पारदर्शी प्रशासन जैसे मुद्दों पर भी बात करता है।
यदि यही मुद्दे चुनावों का केंद्र बने, तो छात्रसंघ चुनाव भारतीय छात्र राजनीति को नई दिशा दे सकते हैं। इससे भविष्य में ऐसा नेतृत्व उभर सकता है, जो संवाद, विकास और समाधान आधारित राजनीति को आगे बढ़ाए।
चुनाव कराना ही पर्याप्त नहीं होगा। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक कॉलेज में निष्पक्ष मतदान, पर्याप्त सुरक्षा, सीसीटीवी निगरानी, शिकायत निवारण तंत्र, एंटी-रैगिंग व्यवस्था और लिंग्डोह समिति के नियमों का सख्ती से पालन हो। चुनाव प्रचार इस प्रकार हो कि नियमित पढ़ाई और परीक्षाएं प्रभावित न हों।
साथ ही छात्र संगठनों और राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी है कि वे लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करें और व्यक्तिगत, जातीय या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से बचें। छात्रसंघ चुनावों का केंद्र छात्र हित होना चाहिए, न कि राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन।
मध्य प्रदेश में छात्रसंघ चुनावों की वापसी केवल एक चुनावी कार्यक्रम नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा और लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। यदि यह प्रक्रिया पारदर्शी, शांतिपूर्ण और छात्र-केंद्रित रही, तो आने वाले वर्षों में प्रदेश को जिम्मेदार छात्र नेता, सक्षम जनप्रतिनिधि और लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाला नेतृत्व मिल सकता है। लेकिन यदि चुनाव धनबल, बाहुबल, हिंसा और अनावश्यक राजनीतिक हस्तक्षेप की भेंट चढ़ गए, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उन लाखों विद्यार्थियों को होगा, जिनका सपना केवल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर भविष्य है।
सितंबर 2026 के छात्रसंघ चुनाव इसलिए केवल प्रतिनिधियों का चुनाव नहीं होंगे, बल्कि यह तय करेंगे कि मध्य प्रदेश के विश्वविद्यालय लोकतंत्र की सशक्त पाठशाला बनेंगे या फिर राजनीतिक संघर्ष का नया अखाड़ा। आने वाला समय इस प्रश्न का उत्तर देगा।














