नई दिल्ली, 05 अगस्त।
चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में कुछ मोड़ ऐसे आते हैं, जो आने वाली कई पीढ़ियों की दिशा तय कर देते हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान दुनिया ने जिस गति से वैक्सीन बनाई और जिस नई तकनीक को अपनाया, उसने यह साबित कर दिया कि जब विज्ञान संकट को अवसर में बदलता है तो असंभव भी संभव हो जाता है। उसी मैसेंजर आरएनए तकनीक को अब वैज्ञानिक कैंसर के खिलाफ सबसे बड़े हथियार के रूप में विकसित कर रहे हैं। शुरुआती नतीजे इतने उत्साहजनक हैं कि विशेषज्ञ मान रहे हैं कि आने वाले वर्षों में कैंसर के इलाज का पूरा परिदृश्य बदल सकता है। मेलानोमा और ब्रेस्ट कैंसर पर हुए हालिया शोध और क्लीनिकल ट्रायल ने उम्मीद जगाई है कि जेनेटिक वैक्सीन के माध्यम से शरीर को इस तरह प्रशिक्षित किया जा सकता है कि वह कैंसर कोशिकाओं को शुरुआती चरण में ही पहचानकर नष्ट कर दे और मरीज को कीमोथेरेपी जैसी कष्टदायक प्रक्रिया से काफी हद तक राहत मिल सके।
इस शोध में भारतीय मूल के वैज्ञानिक डॉ. तेज कुमार पारीक और उनकी टीम की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। डॉ. पारीक लंबे समय से इस दिशा में काम कर रहे हैं कि कोविड वैक्सीन में जिस आरएनए प्लेटफॉर्म का उपयोग हुआ, उसी सिद्धांत को कैंसर के उपचार में कैसे लागू किया जाए। उनका तर्क सरल है। जिस तरह वायरस के प्रोटीन की पहचान कराकर शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय किया गया था, उसी प्रकार कैंसर कोशिकाओं के विशेष मार्कर की जानकारी देकर प्रतिरक्षा तंत्र को उन्हें दुश्मन के रूप में पहचानने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। अब तक कैंसर का उपचार बीमारी होने के बाद सर्जरी, रेडिएशन या दवाओं के माध्यम से उसे समाप्त करने पर आधारित था, जबकि यह नई तकनीक बीमारी की प्रगति को शुरुआती स्तर पर ही रोकने की दिशा में काम करती है। यही कारण है कि इसे चिकित्सा जगत में गेम चेंजर माना जा रहा है।
मेलानोमा त्वचा का सबसे आक्रामक कैंसर है और दुनिया भर में इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। वहीं ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं में सबसे सामान्य कैंसर है। भारत में हर वर्ष बड़ी संख्या में महिलाएं इसकी चपेट में आती हैं और देर से जांच होने के कारण अनेक मामलों में बीमारी अंतिम चरण में पहुंच जाती है। इन दोनों कैंसर की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली कैंसर कोशिकाओं को अपना ही हिस्सा मानकर उन पर हमला नहीं करती। जेनेटिक वैक्सीन इसी कमजोरी को दूर करने का प्रयास करती है। यह कैंसर कोशिकाओं की सतह पर मौजूद असामान्य प्रोटीन की जानकारी प्रतिरक्षा तंत्र को देती है और टी-सेल को सक्रिय करती है, ताकि वे ट्यूमर को बढ़ने से पहले ही नष्ट कर सकें।
प्रयोगशाला और पशुओं पर हुए परीक्षणों के परिणाम वैज्ञानिकों के लिए उत्साहवर्धक रहे हैं। डॉ. पारीक की टीम ने पाया कि वैक्सीन के बाद शरीर में कैंसर विरोधी टी-सेल की संख्या कई गुना बढ़ गई और मेमोरी सेल भी विकसित हुए। इसका अर्थ है कि भविष्य में यदि कैंसर कोशिकाएं दोबारा बनें, तो शरीर उन्हें तुरंत पहचानकर नष्ट कर सकेगा। मानव परीक्षण के शुरुआती चरण में मेलानोमा के कुछ मरीजों को इस वैक्सीन के साथ इम्यूनोथेरेपी दी गई। कई मरीजों में ट्यूमर का आकार काफी घट गया, जबकि कुछ में कैंसर के संकेत लगभग समाप्त हो गए। ब्रेस्ट कैंसर पर भी ट्रायल जारी हैं और शुरुआती परिणाम सकारात्मक हैं, हालांकि वैज्ञानिक अभी व्यापक परीक्षणों की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं।
भारत के लिए इस तकनीक का महत्व और भी अधिक है, क्योंकि यहां कैंसर के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है और इलाज का खर्च आम लोगों की पहुंच से बाहर है। यदि यह जेनेटिक वैक्सीन सफल होती है और कम लागत पर उपलब्ध कराई जा सके, तो यह स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़ी क्रांति साबित हो सकती है। इसके साथ ही शुरुआती जांच और जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है, क्योंकि आज भी बहुत से लोग कैंसर के शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं।
इस तकनीक के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। पहली चुनौती इसकी दीर्घकालिक सुरक्षा को लेकर है। अब तक के परीक्षणों में कोई गंभीर दुष्प्रभाव सामने नहीं आया है, लेकिन बड़े पैमाने पर उपयोग से पहले और अधिक आंकड़ों की जरूरत होगी। दूसरी चुनौती उत्पादन और वितरण की है, क्योंकि आरएनए वैक्सीन को अत्यंत कम तापमान पर सुरक्षित रखना पड़ता है। तीसरी चुनौती इसकी लागत है। यदि यह तकनीक महंगी रही, तो इसका लाभ सीमित लोगों तक ही पहुंच पाएगा। इसलिए सरकार, वैज्ञानिक संस्थानों और निजी क्षेत्र को मिलकर इसे सुलभ और किफायती बनाने की दिशा में काम करना होगा।
फिर भी संभावनाएं इतनी व्यापक हैं कि इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिक अब इस तकनीक को फेफड़ों, कोलन, अग्नाशय और प्रोस्टेट कैंसर पर भी आजमा रहे हैं। प्रत्येक कैंसर के लिए अलग वैक्सीन विकसित करनी होगी, लेकिन तकनीकी आधार एक ही रहेगा। आम लोगों के लिए संदेश स्पष्ट है कि घबराने के बजाय नियमित जांच कराएं, स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं और वैज्ञानिक तथ्यों पर भरोसा रखें। मेलानोमा और ब्रेस्ट कैंसर के लिए विकसित हो रही यह जेनेटिक वैक्सीन केवल incremental advance नहीं, बल्कि चिकित्सा विज्ञान की नई सोच का प्रतीक है। अभी मंजिल दूर है, लेकिन उम्मीद की किरण पहले से कहीं अधिक मजबूत दिखाई दे रही है।














