नई दिल्ली, 05 अगस्त।
सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला ऐसे लिव-इन संबंध में रह रही है, जिसे विवाह के समान संबंध माना जा सकता है, और उसके साथ क्रूरता की जाती है, तो उसके साथी या उसके रिश्तेदारों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत कार्रवाई की जा सकती है। यह फैसला न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ ने सुनाया।
पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा केवल वैध विवाह तक सीमित नहीं मानी जा सकती। बदलते सामाजिक परिवेश में विवाह जैसे स्वरूप वाले लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाओं को भी समान कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए। हालांकि, न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में आरोपी लिव-इन पार्टनर या उसके रिश्तेदारों की गिरफ्तारी प्रारंभिक जांच पूरी किए बिना नहीं की जाएगी। अदालत के अनुसार इसका उद्देश्य झूठे मामलों की संभावना को कम करना और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित करना है।
यह फैसला 'एक्स बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटक एवं अन्य' शीर्षक वाली याचिका पर सुनाया गया। मामले का निपटारा करते हुए न्यायालय ने कहा कि इस निर्णय में की गई टिप्पणियां केवल केस रद्द करने से इनकार के खिलाफ दायर अपीलों तक सीमित हैं और इन्हें मामले के गुण-दोष पर अंतिम टिप्पणी नहीं माना जाना चाहिए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल केवल यह सिद्धांत तय किया गया है कि धारा 498ए विवाह जैसे स्वरूप वाले लिव-इन संबंधों पर भी लागू हो सकती है और गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच आवश्यक होगी। आरोपों की सत्यता या असत्यता का अंतिम निर्णय विचारण के दौरान ही किया जाएगा। इस फैसले के माध्यम से न्यायालय ने एक ओर महिलाओं के कानूनी अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया है तो दूसरी ओर बिना प्रारंभिक जांच के गिरफ्तारी से संरक्षण देकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सिद्धांत को भी महत्व दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि विवाह जैसे स्वरूप वाले लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाओं को भी धारा 498ए के तहत कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा।














