नई दिल्ली, 05 अगस्त।
देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को लेकर इन दिनों एक बार फिर बहस तेज हो गई है। दिल्ली में हाल के विरोध प्रदर्शनों और कानून-व्यवस्था से जुड़े घटनाक्रमों के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारे पास पर्याप्त पुलिस बल है और क्या मौजूदा व्यवस्था अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगाने में सक्षम है। इसी बीच ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट (बीपीआरएंडडी) और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों ने एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखी है। इनके अनुसार 2014 से 2023 के बीच देश में पुलिस बल की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है और आज भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा सिविल पुलिस बल है। इसके बावजूद अपराध के आंकड़े चिंता बढ़ा रहे हैं और प्रति 10 लाख आबादी पर पुलिसकर्मियों की उपलब्धता के मामले में भारत अभी भी अमेरिका जैसे देशों से पीछे है।
वर्ष 2014 में देश में कुल पुलिस बल 13.5 लाख था, जो 2023 तक बढ़कर 21.6 लाख हो गया। यानी एक दशक में लगभग आठ लाख नए पुलिसकर्मियों की भर्ती हुई। इसी अवधि में प्रति 10 लाख आबादी पर पुलिसकर्मियों की संख्या 1,029 से बढ़कर 1,503 हो गई। यह बढ़ोतरी इसलिए भी आवश्यक थी, क्योंकि देश की आबादी तेजी से बढ़ रही है और शहरीकरण के कारण अपराध के नए स्वरूप सामने आए हैं। साइबर अपराध, नशे की तस्करी, संगठित अपराध और आतंकवाद जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए पुलिस बल का आधुनिकीकरण और विस्तार समय की मांग थी। सरकार ने विभिन्न राज्यों में भर्ती अभियान चलाकर कानून-व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास किया।
हालांकि पुलिस बल बढ़ने के साथ अपराध के आंकड़े भी बढ़े हैं। वर्ष 2014 में प्रति 10 लाख आबादी पर अपराध की दर 2,292 थी, जो 2023 में बढ़कर 2,703 हो गई। कोविड महामारी के दौरान 2020 में यह आंकड़ा 3,100 तक पहुंच गया था। बाद के वर्षों में कुछ कमी जरूर आई, लेकिन 2023 में फिर वृद्धि दर्ज की गई। इससे स्पष्ट है कि केवल पुलिस बल की संख्या बढ़ाने से अपराध अपने आप कम नहीं होते। इसके पीछे सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी कारण भी जिम्मेदार हैं। बेरोजगारी, महंगाई, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति और सोशल मीडिया के दुरुपयोग ने अपराध को बढ़ावा दिया है। साथ ही रिपोर्टिंग व्यवस्था बेहतर होने के कारण पहले दब जाने वाले कई मामले अब दर्ज होने लगे हैं।
तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो 2023 के आंकड़ों के अनुसार भारत के पास 21.6 लाख पुलिसकर्मी हैं, जबकि चीन में 19 लाख, अमेरिका में आठ लाख, इंडोनेशिया में 4.4 लाख और नाइजीरिया में 3.7 लाख पुलिसकर्मी हैं। इस दृष्टि से भारत दुनिया का सबसे बड़ा पुलिस बल रखने वाला देश है। लेकिन प्रति 10 लाख आबादी पर पुलिसकर्मियों की संख्या देखें तो भारत में यह 1,503 है, जबकि अमेरिका में 2,376, इंडोनेशिया में 1,552 और नाइजीरिया में 1,632 है। चीन में यह संख्या 1,348 है। यानी जनसंख्या के अनुपात में भारत में अभी भी पुलिस बल की कमी बनी हुई है। इसलिए केवल भर्ती बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, संसाधन और कार्य संस्कृति में भी व्यापक सुधार की आवश्यकता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू निजी सुरक्षा संस्थानों का तेजी से बढ़ता विस्तार है। नए निजी सुरक्षा संस्थान खोलने के मामले में भी भारत दुनिया में अग्रणी बन गया है। शहरीकरण और सुरक्षा संबंधी बढ़ती चिंताओं के कारण अपार्टमेंट, मॉल, उद्योग और निजी प्रतिष्ठानों में सुरक्षा गार्डों की मांग लगातार बढ़ रही है। अनुमान है कि देश में एक करोड़ से अधिक लोग निजी सुरक्षा क्षेत्र में कार्यरत हैं। इसका एक कारण यह भी है कि पुलिस पर काम का बोझ इतना अधिक है कि वह हर स्थान पर तत्काल नहीं पहुंच पाती। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निजी सुरक्षा क्षेत्र का प्रभावी नियमन और प्रशिक्षण सुनिश्चित नहीं किया गया, तो यह भी नई समस्याओं का कारण बन सकता है।
अपराध बढ़ने के पीछे कई अन्य कारण भी हैं। साइबर अपराध, ऑनलाइन ठगी और डिजिटल फ्रॉड के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जबकि पारंपरिक पुलिस व्यवस्था अभी पूरी तरह इसके अनुरूप तैयार नहीं हो पाई है। युवाओं में नशे की बढ़ती लत चोरी, लूट और हिंसा को बढ़ा रही है। शहरों में बढ़ती आर्थिक असमानता भी सामाजिक तनाव और अपराध को जन्म देती है। इसके साथ ही न्यायिक प्रक्रिया में देरी से अपराधियों में कानून का भय कम होता है। इसलिए पुलिस सुधारों के साथ न्यायपालिका और जेल व्यवस्था में भी सुधार जरूरी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त कर अधिक पेशेवर बनाया जाना चाहिए। आधुनिक तकनीक, सीसीटीवी, फेस रिकग्निशन, ड्रोन और डेटा एनालिटिक्स का अधिक उपयोग किया जाए। सामुदायिक पुलिसिंग को बढ़ावा देकर जनता और पुलिस के बीच विश्वास मजबूत किया जाए। पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियों में भी सुधार आवश्यक है। साथ ही शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जागरूकता पर समान रूप से ध्यान देना होगा।
भारत वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.45 प्रतिशत आंतरिक सुरक्षा और पुलिस व्यवस्था पर खर्च करता है, जो अमेरिका और चीन की तुलना में कम है। इसलिए संसाधनों, तकनीक और बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है। पिछले एक दशक में पुलिस बल बढ़ाने के मामले में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन अपराध के आंकड़े बताते हैं कि अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। केवल संख्या बढ़ाने से नहीं, बल्कि पुलिस व्यवस्था में गुणात्मक सुधार, आधुनिक तकनीक, प्रभावी न्याय व्यवस्था और सामाजिक सहभागिता से ही सुरक्षित और अपराध-मुक्त भारत का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।














