नई दिल्ली, 05 अगस्त।
समाज में अक्सर यह मान लिया जाता है कि बचपन मासूमियत और खुशियों का समय होता है, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। आज जेलों में बंद कैदियों पर हुए एक बड़े अध्ययन ने जो तस्वीर सामने रखी है, वह पूरे समाज को झकझोर देने वाली है। अध्ययन में पाया गया कि जेल में बंद करीब 50 प्रतिशत कैदियों ने अपने बचपन में किसी न किसी रूप में भावनात्मक, शारीरिक या यौन शोषण झेला था। यही वे जख्म थे, जो समय के साथ भरने के बजाय और गहरे होते गए तथा अंततः उन्हें अपराध की दुनिया की ओर धकेल दिया। विशेषज्ञ मानते हैं कि बचपन में मिली उपेक्षा और हिंसा का असर केवल कुछ दिनों या महीनों तक नहीं रहता, बल्कि व्यक्ति के पूरे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। इसलिए यदि हम अपराध मुक्त समाज चाहते हैं, तो सबसे पहले बच्चों का बचपन सुरक्षित करना होगा।
दिल्ली की तिहाड़ जेल और देश की अन्य जेलों में किए गए इस अध्ययन में कैदियों से उनके बचपन के अनुभवों के बारे में विस्तार से पूछा गया। सवाल थे—क्या बचपन में मारपीट का सामना करना पड़ा? क्या माता-पिता ने पर्याप्त प्यार और ध्यान दिया? क्या कभी यौन शोषण का शिकार हुए? क्या भूखे रहना या इलाज न मिलने जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा? इन सवालों के जवाब चौंकाने वाले थे। लगभग हर दूसरे कैदी की कहानी में बचपन की कोई न कोई त्रासदी छिपी थी। किसी ने पिता की मार झेली, किसी ने मां की उपेक्षा, तो कई ऐसे भी थे जिन्हें घर के भीतर ही यौन शोषण का सामना करना पड़ा और डर व शर्म के कारण वे कभी कुछ कह नहीं सके। यही वह बिंदु है, जहां से एक मासूम का जीवन अपराध की दिशा में मुड़ने लगता है।
अध्ययन के अनुसार जेल में बंद 61 प्रतिशत कैदी हत्या के मामलों में सजा काट रहे हैं। 2.6 प्रतिशत लोग नशे और तस्करी से जुड़े अपराधों में, 11 प्रतिशत चोरी, डकैती और लूटपाट के मामलों में तथा 4.8 प्रतिशत महिलाओं से जुड़े अपराधों में बंद हैं। वहीं 18.9 प्रतिशत कैदी नशे के आदी पाए गए। इन सभी मामलों के पीछे एक समान कड़ी बचपन का आघात था। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि जब किसी बच्चे को लगातार गाली, मारपीट और उपेक्षा मिलती है, तो उसके भीतर गुस्सा और कुंठा घर कर जाती है। वह दुनिया को अपना दुश्मन समझने लगता है और धीरे-धीरे गलत संगत तथा हिंसक व्यवहार की ओर बढ़ जाता है।
उपेक्षा के कई रूप होते हैं और सभी समान रूप से खतरनाक हैं। शारीरिक उपेक्षा का अर्थ है समय पर भोजन, इलाज, कपड़े और शिक्षा से वंचित रखना। भावनात्मक उपेक्षा का मतलब है बच्चे की बात न सुनना, उसे स्नेह न देना, उसकी उपलब्धियों की सराहना न करना और लगातार दूसरों से तुलना करना। शारीरिक शोषण में मारपीट और चोट पहुंचाना शामिल है, जबकि यौन शोषण सबसे भयावह है, क्योंकि यह बच्चे के मन और शरीर दोनों को गहरे स्तर पर तोड़ देता है। शोध बताते हैं कि ऐसे बच्चों में अवसाद, आत्महत्या के विचार, नशे की लत और आक्रामक व्यवहार की संभावना अधिक होती है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि समाज आज भी इस समस्या को गंभीरता से नहीं ले रहा। माता-पिता काम और तनाव में उलझे हैं, स्कूलों में काउंसलिंग की व्यवस्था सीमित है और पड़ोसी घरेलू हिंसा को निजी मामला मानकर अनदेखा कर देते हैं। परिणाम यह होता है कि बच्चा अकेला पड़ जाता है और अपने दर्द को भीतर ही भीतर दबाए रखता है। बाद में जब वही बच्चा अपराध करता है, तो समाज केवल उसे दोषी ठहराता है, लेकिन उसके टूटे हुए बचपन पर विचार नहीं करता।
यदि समय रहते परिवार, स्कूल और समाज मिलकर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दें, तो अनेक अपराध रोके जा सकते हैं। माता-पिता को समझना होगा कि अनुशासन के नाम पर हिंसा बच्चों के भविष्य को नुकसान पहुंचाती है। बच्चों से संवाद, विश्वास और अपनापन जरूरी है। स्कूलों में प्रभावी काउंसलिंग व्यवस्था हो और सरकार घरेलू हिंसा से प्रभावित बच्चों की पहचान कर उन्हें समय पर संरक्षण और परामर्श उपलब्ध कराए। बाल संरक्षण तंत्र और पुलिस को भी ऐसे मामलों में संवेदनशील और त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए।
समाज की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि किसी बच्चे के साथ हिंसा या शोषण का संदेह हो, तो उसे नजरअंदाज करने के बजाय मदद के लिए आगे आना चाहिए। मीडिया और मनोरंजन माध्यमों को भी बच्चों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य पर जागरूकता बढ़ाने वाले कार्यक्रमों को प्राथमिकता देनी चाहिए। बचपन के घाव दिखाई नहीं देते, लेकिन उनके परिणाम पूरे समाज को भुगतने पड़ते हैं। इसलिए बच्चों को प्यार, सुरक्षा, सम्मान और विश्वास से भरा वातावरण देना ही एक सुरक्षित, संवेदनशील और अपराध मुक्त भारत की सबसे मजबूत नींव है।














