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संपादकीय
05 Aug, 2026

जलवायु परिवर्तन से खेती पर संकटदेश के 651 जिलों में से 310 हाई रिस्क जोन में, राजस्थान सबसे ज्यादा प्रभावित

जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर से देश के 310 जिले हाई रिस्क जोन में पहुंच गए हैं, जिससे खेती, खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका पर गंभीर चुनौतियां खड़ी होने की आशंका बढ़ गई है।

नई दिल्ली, 05 अगस्त।

देश में जलवायु परिवर्तन अब केवल मौसम की बात नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे हमारी थाली से जुड़ा संकट बन चुका है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के ताजा आकलन ने चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार देश के 651 जिलों में से 310 जिले अब हाई रिस्क जोन में आ चुके हैं, जहां जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर खेती और खाद्य सुरक्षा पर पड़ रहा है। सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में राजस्थान सबसे ऊपर है, जहां 17 जिले इस श्रेणी में हैं। इसके बाद उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य भी गंभीर जोखिम का सामना कर रहे हैं। यह स्थिति संकेत देती है कि आने वाले समय में देश की कृषि और किसान दोनों के सामने अभूतपूर्व चुनौतियां खड़ी होने वाली हैं। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो खाद्यान्न की कीमतों में वृद्धि के साथ किसानों की आर्थिक परेशानी, पलायन और आत्महत्या जैसी समस्याएं भी गहरा सकती हैं।

आईसीएआर की इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए पिछले कई वर्षों के तापमान, वर्षा, सूखा, बाढ़ और फसल उत्पादन के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कहीं अत्यधिक वर्षा हो रही है तो कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ रहा है। तापमान में लगातार वृद्धि से गेहूं और धान जैसी प्रमुख फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है। राजस्थान में स्थिति और अधिक गंभीर है, क्योंकि वहां पहले से ही जल संकट है। अब भीषण गर्मी और लू की अवधि बढ़ने से फसलें समय से पहले पक रही हैं और उत्पादन में भारी गिरावट आ रही है। जोधपुर, बीकानेर और बाड़मेर जैसे जिलों में किसान पारंपरिक फसलों की जगह कम पानी वाली फसलों की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन बाजार और सरकारी समर्थन के अभाव में उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा।

उत्तर प्रदेश और बिहार में चुनौती का स्वरूप अलग है। यहां बाढ़ और जलभराव की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। मानसून के दौरान नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ने से खेतों में खड़ी फसलें नष्ट हो जाती हैं। वहीं सर्दियों में कोहरा और पाला भी उत्पादन को प्रभावित करता है। कई जिलों में लगातार तीन-चार वर्षों तक सूखा या बाढ़ जैसी स्थितियां बनी रहने से खेती अनिश्चित हो गई है। किसान यह तय नहीं कर पा रहा कि किस फसल की बुवाई करे। कर्ज लेकर खेती करने के बाद भी जब उपज नहीं मिलती, तो वह आर्थिक संकट में फंस जाता है। यही कारण है कि अनेक क्षेत्रों में किसानों की मानसिक और आर्थिक परेशानियां लगातार बढ़ रही हैं।

इस पूरे संकट का सबसे बड़ा असर देश की खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा। भारत की आबादी लगातार बढ़ रही है और अनुमान है कि वर्ष 2050 तक यह 160 करोड़ के पार पहुंच सकती है। ऐसे में यदि 310 जिलों की कृषि लगातार प्रभावित होती रही, तो देश के लिए खाद्यान्न उत्पादन बनाए रखना कठिन हो जाएगा। गेहूं और चावल के उत्पादन पर पहले ही दबाव दिखाई देने लगा है, जबकि दलहन और तिलहन जैसी फसलें जलवायु परिवर्तन के प्रति और अधिक संवेदनशील हैं। इसका सीधा असर बाजार में महंगाई के रूप में सामने आएगा और गरीब तथा मध्यम वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होगा। इसलिए कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि अब खेती को बदलती जलवायु के अनुरूप ढालना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

सरकार और कृषि वैज्ञानिक इस चुनौती से निपटने के लिए कई योजनाओं पर काम कर रहे हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन के तहत सूखा-रोधी और बाढ़-सहनशील बीजों को बढ़ावा दिया जा रहा है। फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि किसान केवल एक फसल पर निर्भर न रहें। ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी दी जा रही है, ताकि कम पानी में अधिक उत्पादन संभव हो सके। मौसम आधारित फसल बीमा और किसान क्रेडिट कार्ड जैसी योजनाओं को भी अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का क्रियान्वयन अभी भी अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाया है और अनेक किसान इन सुविधाओं से अब भी वंचित हैं।

केवल सरकारी योजनाएं ही पर्याप्त नहीं होंगी। किसानों को भी अपनी खेती की पद्धति बदलनी होगी। पारंपरिक अनुभव और आधुनिक विज्ञान का संतुलित उपयोग करना होगा। कम पानी वाली फसलों को अपनाना, मल्चिंग के माध्यम से मिट्टी की नमी बनाए रखना, जैविक खाद का उपयोग बढ़ाना तथा वर्षा जल संचयन जैसी तकनीकों को गांव-गांव तक पहुंचाना आवश्यक है। पंचायत स्तर पर जलवायु मित्र किसान समूह बनाकर नई तकनीकों और बेहतर कृषि पद्धतियों की जानकारी साझा की जा सकती है।

राजस्थान इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यहां कई क्षेत्रों में बाजरा और मूंग जैसे मोटे अनाज की खेती दोबारा बढ़ रही है, जो कम पानी में भी अच्छी पैदावार देते हैं। सौर ऊर्जा से संचालित पंपों का उपयोग बढ़ा है और खेतों में वृक्षारोपण को भी प्रोत्साहन मिल रहा है। लेकिन इन प्रयासों को सफल बनाने के लिए नीति स्तर पर मजबूत समर्थन और प्रभावी बाजार व्यवस्था जरूरी है।

जलवायु परिवर्तन वैश्विक चुनौती है, लेकिन इसका सबसे अधिक प्रभाव भारत जैसे कृषि प्रधान देशों पर पड़ रहा है। 310 जिलों का हाई रिस्क जोन में पहुंचना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि गंभीर चेतावनी है। यदि सरकार, वैज्ञानिक और किसान मिलकर जलवायु अनुकूल कृषि को प्राथमिकता दें, तो इस संकट को अवसर में बदला जा सकता है। यही रास्ता देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों के सुरक्षित भविष्य की सबसे मजबूत आधारशिला बनेगा।

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