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एक्सक्लूसिव
23 Sep, 2026

टैरिफ की कीमत: अमेरिका में बदलता जनमत और भारत के लिए सबक

अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों को लेकर गहराते राजनीतिक और सामाजिक विभाजन के बीच, भारत को अपनी निर्यात निर्भरता कम करने और वैश्विक बाजारों में विविधता लाने की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है।

नई दिल्ली, 23 सितंबर।

अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति अब केवल व्यापार और उद्योग का विषय नहीं रह गई है। कनाडा के साथ बढ़ता व्यापार तनाव, आयातित वस्तुओं की कीमतों पर असर और नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों की पृष्ठभूमि ने इसे सीधे अमेरिकी मतदाताओं के रोजमर्रा के जीवन से जोड़ दिया है। हाल में अमेरिकी अखबारों की जमीनी रिपोर्टों में अलग-अलग राज्यों के मतदाताओं से बातचीत की गई तो तस्वीर एकरंगी नहीं दिखी। कुछ मतदाता ट्रंप के इस तर्क के साथ खड़े हैं कि अमेरिका को दशकों से दूसरे देशों के साथ व्यापार में नुकसान हुआ और अब बराबरी की शर्तें जरूरी हैं। लेकिन कई मतदाता बढ़ती कीमतों और कनाडा जैसे पारंपरिक सहयोगी के साथ टकराव को लेकर असहज भी दिखाई देते हैं।

यह विभाजन आंकड़ों में भी दिखाई देता है। प्यू रिसर्च सेंटर के जनवरी 2026 के सर्वेक्षण में 60 प्रतिशत अमेरिकी वयस्कों ने ट्रंप प्रशासन द्वारा टैरिफ में बड़ी वृद्धि का विरोध किया, जबकि 37 प्रतिशत ने इसका समर्थन किया। हालांकि रिपब्लिकन और डेमोक्रेट मतदाताओं के विचारों में बड़ा अंतर रहा। मार्च 2026 के एक अन्य प्यू सर्वेक्षण में 63 प्रतिशत अमेरिकियों ने कहा कि उन्हें ट्रंप की टैरिफ नीति संभालने की क्षमता पर बहुत कम या बिल्कुल भरोसा नहीं है।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। ट्रंप के समर्थकों का तर्क है कि टैरिफ का उद्देश्य केवल विदेशी वस्तुओं को महंगा करना नहीं, बल्कि अमेरिकी कंपनियों को देश में उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना है। कुछ मतदाता इसे लंबे समय की आर्थिक रणनीति के रूप में देखते हैं। समस्या यह है कि इस रणनीति का तत्काल असर उपभोक्ता तक पहुंच सकता है। आयात पर लगाया गया शुल्क विदेशी कंपनी सीधे अमेरिकी सरकार को नहीं देती; अमेरिकी आयातक शुल्क चुकाता है और उसका कुछ हिस्सा ऊंची कीमतों के रूप में उपभोक्ता तक पहुंच सकता है। मिनियापोलिस फेडरल रिजर्व के हालिया विश्लेषण में भी टैरिफ का अमेरिकी उपभोक्ता कीमतों पर असर दिखाई देने की बात कही गई है।

कनाडा का मामला इसलिए ज्यादा संवेदनशील है क्योंकि यह अमेरिका का पड़ोसी ही नहीं, बल्कि उसकी सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारियों में से एक है। हाल के एक सर्वेक्षण में मिशिगन के 68 प्रतिशत स्वतंत्र मतदाताओं ने कनाडा पर लगाए गए टैरिफ को अस्वीकार किया। रिपब्लिकन मतदाताओं में हालांकि बहुमत ने इन टैरिफ का समर्थन किया। यानी राजनीतिक पहचान यहां भी आर्थिक नीति पर राय को प्रभावित कर रही है।

यही कारण है कि अमेरिकी टैरिफ नीति को भारत के नजरिए से भी देखना जरूरी है। भारत और अमेरिका का द्विपक्षीय वस्तु एवं सेवा व्यापार 2025 में करीब 239.6 अरब डॉलर रहा। इसमें अमेरिका को भारत का निर्यात 103.8 अरब डॉलर था, जबकि भारत ने अमेरिका से 45.4 अरब डॉलर के सामान आयात किए। भारत के कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी 2024 में लगभग 18.3 प्रतिशत थी। इसलिए अमेरिकी बाजार में किसी बड़े शुल्क परिवर्तन का असर भारतीय उद्योगों पर पड़ना स्वाभाविक है।

भारत पहले ही अमेरिकी टैरिफ के दबाव का सामना कर चुका है। अमेरिकी प्रशासन ने 2026 में भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाए हैं, हालांकि भारत सरकार के अनुसार लगभग 45 प्रतिशत भारतीय निर्यात इन अतिरिक्त 10 प्रतिशत शुल्कों के दायरे से बाहर हैं। सरकार ने यह भी कहा है कि भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत जारी है।

भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि किसी एक बाजार पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम पैदा करती है। अमेरिका भारतीय दवाओं, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग उत्पादों, वस्त्रों और कई सेवा क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण बाजार है। इसलिए भारतीय उद्योग को अमेरिकी बाजार बनाए रखने के साथ यूरोप, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और एशिया के अन्य बाजारों में भी अपनी मौजूदगी बढ़ानी होगी।

टैरिफ के इस दौर में अमेरिका भी एक परीक्षा से गुजर रहा है। यदि शुल्क घरेलू उत्पादन बढ़ाते हैं और रोजगार पैदा करते हैं तो उसका लाभ लंबे समय में दिखाई दे सकता है। लेकिन यदि उनका बड़ा हिस्सा उपभोक्ता कीमतों, उत्पादन लागत और व्यापारिक अनिश्चितता के रूप में लौटता है, तो अमेरिकी मतदाता उसका हिसाब मांग सकते हैं। हालिया सर्वेक्षणों और जमीनी रिपोर्टों से फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अमेरिकी समाज इस नीति पर एकमत नहीं है।

भारत के लिए संदेश और स्पष्ट है - वैश्विक व्यापार अब केवल बाजार का मामला नहीं रहा। यह कूटनीति, ऊर्जा, रोजगार, कीमतों और राष्ट्रीय हितों से भी जुड़ चुका है। ऐसे समय में भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय विविध बाजार, प्रतिस्पर्धी उत्पादन और मजबूत व्यापारिक बातचीत ही वह रास्ता है, जो बदलती अमेरिकी व्यापार नीति के झटकों को सीमित कर सकता है।

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