नई दिल्ली, 07 मई।
सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक प्रथाओं को न्यायालय में चुनौती दिए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि हर धार्मिक परंपरा को अदालत में चुनौती दी जाने लगी तो इसका प्रभाव धर्म और समाज दोनों पर पड़ेगा। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में सैकड़ों याचिकाएं दाखिल होंगी और प्रत्येक परंपरा व रीति पर प्रश्न उठने लगेंगे, जिससे सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।
यह टिप्पणी नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने उस समय की, जब वह विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी। इनमें केरल के सबरीमाला मंदिर से संबंधित मामला तथा दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़ा विवाद भी शामिल है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यदि हर व्यक्ति धार्मिक परंपराओं को चुनौती देने लगेगा तो इसका प्रभाव भारतीय समाज पर पड़ेगा, क्योंकि यहां धर्म समाज से गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि इससे मंदिरों के खुलने और बंद होने जैसे विषय भी न्यायालयों तक पहुंच सकते हैं।
न्यायालय ने यह भी कहा कि दाऊदी बोहरा समुदाय से संबंधित लगभग चालीस वर्ष पुरानी जनहित याचिका की वैधता पर प्रश्न उठ रहे हैं। न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश ने टिप्पणी की कि यदि इस प्रकार के विवादों को बढ़ावा दिया गया तो हर व्यक्ति हर विषय पर प्रश्न उठाने लगेगा, जिससे न केवल धार्मिक व्यवस्था प्रभावित होगी बल्कि न्यायालयों पर भी अनावश्यक बोझ बढ़ेगा।
वहीं, सुधारवादी दाऊदी बोहरा समूह की ओर से दलील दी गई कि यदि कोई धार्मिक परंपरा मौलिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है तो उसे संवैधानिक प्रावधानों के तहत सीमित किया जा सकता है।
इस पर न्यायालय ने कहा कि यह तय करना आवश्यक है कि धार्मिक प्रथाओं पर प्रश्न कहां और कैसे उठाए जाएं तथा क्या यह समुदाय के भीतर ही होना चाहिए या न्यायालय और राज्य को इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए।
सुनवाई में यह भी उल्लेख किया गया कि वर्ष 1962 के एक पुराने निर्णय को लेकर विवाद जारी है, जिसमें धार्मिक आधार पर समुदाय से निष्कासन को लेकर कानूनी स्थिति स्पष्ट की गई थी। सबरीमाला मंदिर मामले में भी केंद्र सरकार ने परंपराओं के सम्मान की आवश्यकता पर बल देते हुए तर्क प्रस्तुत किए हैं।






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