रीवा, 07 मई।
रीवा जिले से लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित सिरमौर का वन क्षेत्र इन दिनों अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के साथ-साथ प्राचीन शैलचित्रों को लेकर चर्चा में है। घने जंगलों, पहाड़ियों और जलप्रपातों के बीच मौजूद यह ऐतिहासिक धरोहर अब संरक्षण और विकास के बीच संतुलन की गंभीर चुनौती बन गई है।
सिरमौर क्षेत्र की चट्टानों पर उकेरे गए ये शैलचित्र आदिमानव सभ्यता की कहानी को दर्शाते हैं। गेरुए रंगों से बने इन चित्रों में शिकार के दृश्य, हाथियों की सवारी, सामूहिक नृत्य और उस दौर के सामाजिक जीवन की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। विशेषज्ञों और इतिहासकारों का मानना है कि ये चित्र हड़प्पा कालीन सभ्यता के समकालीन हो सकते हैं। यदि यह प्रमाणित होता है, तो यह क्षेत्र वैश्विक पुरातात्विक महत्व प्राप्त कर सकता है।
कन्या महाविद्यालय रीवा के प्रोफेसर डॉ. मुकेश एंगल के अनुसार ये शैलचित्र केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि मानव सभ्यता के प्रारंभिक चरणों का महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। इनसे उस समय के जीवन, समाज और प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंधों को समझने में मदद मिलती है।
इन शैलचित्रों की एक अनोखी विशेषता यह भी है कि इनके रंग मौसम के अनुसार बदलते प्रतीत होते हैं। विशेषज्ञ इसे चट्टानों में मौजूद प्राकृतिक खनिज तत्वों और पर्यावरणीय प्रभावों का परिणाम मानते हैं, जिससे इनकी रहस्यमयी पहचान और भी बढ़ जाती है।
हालांकि यह धरोहर अब धीरे-धीरे खतरे की ओर बढ़ रही है। बारिश और प्राकृतिक मौसम परिवर्तन के कारण चित्रों के रंग फीके पड़ रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा खतरा मानवीय गतिविधियों से बताया जा रहा है। खनन, पत्थर तोड़ने और गिट्टी निकालने जैसी गतिविधियों से कई चट्टानें क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। साथ ही जागरूकता की कमी के कारण लोग चट्टानों पर नाम लिखने और तोड़फोड़ जैसी हरकतें भी कर रहे हैं।
दूसरी ओर सरकार इस क्षेत्र को धार्मिक और पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रही है। सड़क निर्माण और पर्यटन सुविधाओं से जुड़ी योजनाएं तैयार की जा रही हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह विकास बिना वैज्ञानिक संरक्षण नीति के हुआ तो यह धरोहर गंभीर नुकसान झेल सकती है। बढ़ते पर्यटन दबाव से भी शैलचित्रों के सुरक्षित रहने पर खतरा मंडरा सकता है।
इतिहासकारों का मानना है कि सिरमौर के शैलचित्रों को अब तक वैसी वैश्विक पहचान नहीं मिल सकी जैसी भीमबेटका को मिली है, जिसका कारण शोध और संरक्षण की कमी है। यदि इस दिशा में गंभीर प्रयास किए जाएं तो यह स्थल भी विश्व मानचित्र पर महत्वपूर्ण पहचान बना सकता है।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि पूरे क्षेत्र को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाए, नियंत्रित पर्यटन लागू हो और व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाया जाए। उनका कहना है कि ये शैलचित्र केवल पत्थरों पर बनी आकृतियां नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की जड़ों का महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।
आज सिरमौर एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां विकास और विरासत संरक्षण आमने-सामने हैं। ऐसे में यह जिम्मेदारी समाज और प्रशासन दोनों की है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अनमोल ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखा जाए।












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