नई दिल्ली, 14 मई।
केरल में मुख्यमंत्री पद को लेकर लंबे समय से चल रही अटकलों पर आखिरकार विराम लग गया है। कांग्रेस नेतृत्व ने वरिष्ठ नेता वीडी सतीशन को कांग्रेस विधायक दल का नेता चुन लिया है, जिसके बाद उनका राज्य का अगला मुख्यमंत्री बनना तय माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री पद की दौड़ में पहले केसी वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला जैसे वरिष्ठ नेताओं के नाम भी चर्चा में रहे, लेकिन पार्टी ने अंततः उस नेता पर भरोसा जताया जिसने हाल के वर्षों में यूडीएफ को मजबूत करने और सत्ता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।
वीडी सतीशन का राजनीतिक जीवन छात्र राजनीति से शुरू होकर धीरे-धीरे राज्य की शीर्ष राजनीति तक पहुंचा है। उन्हें केरल की राजनीति में एक तेजतर्रार वक्ता, गहन अध्ययनशील नेता और मजबूत जनाधार वाले जनप्रतिनिधि के रूप में जाना जाता है। विधानसभा में तथ्य और दस्तावेजों के साथ सरकार को घेरने की उनकी शैली ने उन्हें कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में शामिल किया।
वडासेरी दामोदरन सतीशन का जन्म 31 मई 1964 को एर्नाकुलम जिले के नेट्टूर में हुआ था। वे के दामोदरन मेनन और वी विलासिनी अम्मा के पुत्र हैं। साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले सतीशन की राजनीति किसी राजनीतिक विरासत से नहीं बल्कि छात्र आंदोलनों और संगठनात्मक सक्रियता से विकसित हुई।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा पनांगड हाईस्कूल में हुई, इसके बाद उन्होंने सैक्रेड हार्ट कॉलेज थेवारा से स्नातक किया। सामाजिक विषयों में रुचि के चलते उन्होंने राजगिरी कॉलेज ऑफ सोशल साइंसेज, कोच्चि से मास्टर ऑफ सोशल वर्क की डिग्री हासिल की और बाद में एलएलबी व एलएलएम की पढ़ाई पूरी की। यही शैक्षणिक पृष्ठभूमि उनकी राजनीतिक शैली की नींव बनी।
राजनीति में आने से पहले उन्होंने केरल उच्च न्यायालय में लगभग एक दशक तक वकालत की, जहां संवैधानिक और प्रशासनिक मामलों की उनकी समझ और गहरी हुई। इसी अनुभव के कारण विधानसभा में उनके भाषण केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि कानूनी और तथ्यात्मक आधार पर मजबूत माने जाते हैं।
छात्र राजनीति में उन्होंने केरल स्टूडेंट्स यूनियन से शुरुआत की और महात्मा गांधी विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बने। बाद में एनएसयूआई के राष्ट्रीय सचिव के रूप में भी कार्य किया और युवा कांग्रेस से होते हुए मुख्यधारा की राजनीति में मजबूत पहचान बनाई।
1996 में पहली बार परवूर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने पर उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने क्षेत्र में लगातार सक्रियता बनाए रखी। 2001 में उन्हें पहली बार विधायक बनने का अवसर मिला और इसके बाद 2001, 2006, 2011, 2016, 2021 और 2026 में वे लगातार निर्वाचित होते रहे।
2026 के चुनाव में उन्होंने भाकपा के ईटी टायसन मास्टर को बड़े अंतर से पराजित किया, जिसे यूडीएफ की वापसी का संकेत माना गया। उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री के करुणाकरण के करीबी नेताओं में भी गिना जाता रहा है, हालांकि बाद में उन्होंने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान स्थापित की।
विधानसभा में विपक्ष के नेता रहते हुए उन्होंने सौर घोटाला और बार रिश्वत जैसे मामलों को प्रमुखता से उठाया और वाम लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार को लगातार घेरा। बेरोजगारी, आर्थिक स्थिति और प्रशासनिक फैसलों पर उनकी आक्रामक शैली चर्चा में रही।
2021 में उन्हें कांग्रेस नेतृत्व ने विपक्ष का नेता बनाया, जिसके बाद उन्होंने संगठन में नई पीढ़ी को आगे लाने और जनसंपर्क आधारित राजनीति पर जोर दिया। 2026 के चुनाव में यूडीएफ की जीत में उनकी रणनीति को निर्णायक माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री पद की उनकी दावेदारी को आईयूएमएल सहित सहयोगी दलों के समर्थन से मजबूती मिली, जिसके बाद कांग्रेस नेतृत्व ने विचार-विमर्श के बाद उनके नाम पर अंतिम मुहर लगा दी।















