नई दिल्ली, 07 मई।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने वंदे मातरम को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान दर्जा देने और इसके सभी छह छंदों को अनिवार्य करने से जुड़े केंद्रीय मंत्रिमंडल के निर्णय को सख्ती से खारिज कर दिया है। बोर्ड ने इसे संविधान की मूल भावना और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के विरुद्ध बताया है।
बोर्ड की ओर से कहा गया कि सरकारी और शैक्षणिक संस्थानों में सभी कार्यक्रमों के दौरान जन गण मन से पहले वंदे मातरम के पूरे छह छंदों का गायन अनिवार्य करना संवैधानिक व्यवस्था और ऐतिहासिक सहमतियों के खिलाफ है।
प्रवक्ता ने अपने बयान में कहा कि यह निर्णय धार्मिक स्वतंत्रता और देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को प्रभावित करने वाला है। उनका कहना है कि एक धर्मनिरपेक्ष देश किसी भी नागरिक पर धार्मिक आस्था से जुड़ा कोई विचार अनिवार्य रूप से नहीं थोप सकता।
बयान में यह भी कहा गया कि वंदे मातरम के कई छंदों में देवी दुर्गा और अन्य धार्मिक प्रतीकों की स्तुति का उल्लेख है, जो एकेश्वरवाद की इस्लामी मान्यता से मेल नहीं खाता।
बोर्ड ने यह भी तर्क दिया कि इस्लाम केवल एक ईश्वर की उपासना की शिक्षा देता है और किसी प्रकार की साझेदारी को स्वीकार नहीं करता।
प्रवक्ता ने ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 1937 में रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर केवल पहले दो छंदों को स्वीकार किया गया था, क्योंकि बाकी छंद धार्मिक प्रकृति के थे। बाद में संविधान सभा ने भी केवल प्रथम दो छंदों को मान्यता दी थी।
बोर्ड ने कहा कि सभी छह छंदों को अनिवार्य करना ऐतिहासिक सहमति से विचलन है और इससे सामाजिक संवेदनशीलता प्रभावित हो सकती है।
बयान में आगे कहा गया कि देश की एकता और अखंडता किसी एकरूपता या दबाव से नहीं बल्कि संविधान, आपसी सम्मान और धार्मिक स्वतंत्रता से मजबूत होती है।
बोर्ड ने सरकार से इस निर्णय को तुरंत वापस लेने की मांग की है और चेतावनी दी है कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो कानूनी रास्ता अपनाया जाएगा।



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