वेद मंदिर योल में चल रहे 78 दिवसीय चार वेदों के यज्ञानुष्ठान के 31वें दिन स्वामी राम स्वरूप योगाचार्य ने श्रद्धालुओं को वेद ज्ञान के महत्व पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि आज के समय में विभिन्न देशों की अपनी-अपनी व्यवस्थाएं, इतिहास और संविधान हैं, लेकिन सृष्टि के आरंभ में पूरी पृथ्वी पर एक ही शासन और एक समान व्यवस्था विद्यमान थी, जिसका उल्लेख वेदों में मिलता है।
उन्होंने बताया कि प्रलय के उपरांत जब परमेश्वर सृष्टि की पुनः रचना करते हैं, तब समस्त ज्ञान वेदों के माध्यम से ही प्रकट होता है। इसी कारण सृष्टि की उत्पत्ति, प्राचीन सभ्यता और मानव जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने के लिए वेद अध्ययन को अनिवार्य बताया गया है।
स्वामी जी ने कहा कि वेदों के समान गहन और सर्वांगीण ज्ञान अन्य किसी स्रोत से प्राप्त नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि वर्तमान समय में वेदज्ञ तपस्वियों से गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से ज्ञान ग्रहण करने की परंपरा कमजोर पड़ गई है और लोग अपने-अपने तरीके से भक्ति मार्ग बना रहे हैं। इस संदर्भ में उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास के दोहे का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य मोहवश वेदसम्मत मार्ग से हटकर नए-नए पंथों की कल्पना कर रहा है।
स्वामी राम स्वरूप ने सांख्य शास्त्र के मुनि कपिल के सूत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि जो सत्य प्रमाणों से सिद्ध हो, उसका खंडन केवल कल्पनाओं के आधार पर संभव नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वेद, उपनिषद, गीता और रामायण जैसे ग्रंथों में निहित ज्ञान ही प्रमाणिक और सत्य है, जिसे प्राचीन ऋषियों, भगवान श्रीराम और योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में अपनाया।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे वेद और योग विद्या को अपने जीवन में अपनाकर सत्य मार्ग पर चलें, क्योंकि यही मानव कल्याण का वास्तविक आधार है।







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