08 मई।
मध्य प्रदेश के कई जिलों — रायसेन, विदिशा, नर्मदापुरम, भोपाल, राजगढ़, नरसिंहपुर, बुंदेलखंड, महाकौशल और मालवा — में पिछले एक सप्ताह के दौरान आई तेज आंधी और बारिश ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया। पहले खेतों में खड़ी फसल प्रभावित हुई और अब कटाई के बाद खलिहानों व घरों के बाहर रखी उपज भी भीगकर खराब हो गई है। गेहूं का रंग बदलना, दानों का काला पड़ना और नमी बढ़ जाना किसानों के लिए दोहरी मार बन गया है।
कटाई के बाद किसान फसल को मंडियों तक पहुंचाने की तैयारी में थे। कई जगह ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में लदी उपज कतारों में खड़ी थी, तभी मौसम ने करवट ले ली। तेज हवाओं और बारिश ने न सिर्फ फसल को भिगो दिया, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी घटा दी। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि खराब हुई फसल को कौन खरीदेगा और किसानों को उचित मूल्य कैसे मिलेगा।
सरकार ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अधिकारियों को तुरंत सर्वे और राहत कार्य शुरू करने के निर्देश दिए हैं। राजस्व और कृषि विभाग की टीमें नुकसान का आकलन कर रही हैं। राज्य सरकार आपदा राहत कोष से मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू कर सकती है, लेकिन यह सहायता अक्सर वास्तविक नुकसान की तुलना में कम साबित होती है।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बीमा कराने वाले किसान दावा कर सकते हैं, लेकिन क्लेम प्रक्रिया जटिल और समय लेने वाली रहती है। सर्वे में देरी और तकनीकी कारणों से भुगतान अटक जाता है। वहीं बड़ी संख्या में किसान बीमा सुरक्षा से बाहर भी हैं।
समर्थन मूल्य पर खरीद को लेकर भी सरकार के सामने चुनौती है। अधिक नमी या काले पड़े दानों वाली फसल मंडियों में कटौती या अस्वीकृति का शिकार हो सकती है। ऐसे में गुणवत्ता मानकों में अस्थायी छूट पर विचार करना जरूरी होगा, ताकि किसानों को न्यूनतम नुकसान हो।
यह संकट केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि नीति और क्रियान्वयन की परीक्षा भी है। त्वरित सर्वे, पारदर्शी मुआवजा, सरल बीमा प्रक्रिया और लचीली खरीद नीति ही किसानों को इस मुश्किल समय से राहत दिला सकती है।