जम्मू, 16 मई।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने हिजबुल मुजाहिदीन से जुड़े आतंकी नावेद मुश्ताक उर्फ नावेद बाबू के भाई सैयद इरफान अहमद की जमानत याचिका को खारिज करते हुए विशेष एनआईए अदालत जम्मू के निर्णय को बरकरार रखा है, जिससे आतंकी साजिश से जुड़े इस मामले में राहत नहीं मिल सकी।
डिवीजन बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति सिंधु शर्मा और न्यायमूर्ति शहजाद अज़ीम शामिल थे, ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड में उपलब्ध सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि आरोपित आतंकी गतिविधियों, आतंकियों को सहायता पहुंचाने तथा देश के खिलाफ युद्ध जैसी गतिविधियों में संलिप्त रहा है।
अदालत के अनुसार आरोपित पर यह भी संदेह है कि वह हिजबुल आतंकी नावेद बाबू, अधिवक्ता इरफान शफी मीर तथा निलंबित डीएसपी दविंदर सिंह के बीच संपर्क स्थापित करने में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा था। जांच में कॉल डिटेल रिकॉर्ड सहित अन्य साक्ष्यों के आधार पर लगातार संपर्क और आतंकियों को परिवहन, आश्रय तथा अन्य लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराने के संकेत मिले हैं।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम के तहत आने वाले मामलों में सामान्य आपराधिक मामलों की जमानत नीति लागू नहीं की जा सकती।
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत आतंकवाद से जुड़े मामलों में अलग दृष्टि से देखा जाता है और ऐसे मामलों में सख्त मानदंड लागू होते हैं।
यह पूरा मामला जनवरी 2020 का है, जब हिजबुल आतंकी नावेद बाबू, एक अन्य आतंकी, निलंबित डीएसपी दविंदर सिंह और अधिवक्ता इरफान शफी मीर को कुलगाम में गिरफ्तार किया गया था।




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