बढ़ते लोकसभा प्रतिनिधित्व के साथ मंत्रिमंडल के संभावित विस्तार और मंत्रालयों के बढ़ते विभाजन को लेकर प्रशासनिक दक्षता, समन्वय व्यवस्था और सुशासन पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, जिससे भविष्य की शासन संरचना पर नई बहस शुरू हो गई है।
12 मई।
लोकसभा की संभावित सीट वृद्धि को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक चर्चाएं तेज हो रही हैं। लेकिन इस बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू ऐसा भी है, जिस पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जा रहा है। यदि भविष्य में लोकसभा की सदस्य संख्या 850 तक पहुंचती है, तो संविधान के अनुच्छेद 75(1A) और 91वें संविधान संशोधन के तहत केंद्र सरकार में मंत्रियों की अधिकतम संख्या 15 प्रतिशत के हिसाब से 127.5 तक जा सकती है। वर्तमान में 543 सदस्यीय लोकसभा में यह सीमा लगभग 81 मंत्रियों तक रहती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि भविष्य में मंत्रियों की संख्या इतनी बढ़ती है, तो उनके लिए मंत्रालय और जिम्मेदारियां आखिर आएंगी कहां से?
भारतीय राजनीति में मंत्रिमंडल विस्तार केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन का भी महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, जातीय समीकरण, सहयोगी दलों की मांग और संगठनात्मक दबाव के कारण सरकारों को लगातार नए मंत्री पदों का निर्माण करना पड़ता है। यही वजह है कि कई बार एक ही क्षेत्र से जुड़े विषयों को अलग-अलग मंत्रालयों में बांट दिया जाता है।
परिवहन क्षेत्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। रेलवे के लिए अलग मंत्री, सड़क परिवहन के लिए अलग, जहाजरानी के लिए अलग और नागरिक उड्डयन के लिए अलग मंत्रालय मौजूद हैं। इसी प्रकार ऊर्जा क्षेत्र में कोयला, पेट्रोलियम, बिजली और वैकल्पिक ऊर्जा के लिए अलग-अलग मंत्रालय बनाए गए हैं। उद्योग क्षेत्र में भी भारी उद्योग, एमएसएमई, इस्पात, वस्त्र और अन्य विभागों को अलग-अलग हिस्सों में विभाजित किया गया है। सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक दृष्टि से यह विभाजन वास्तव में आवश्यक है या फिर यह केवल राजनीतिक समायोजन का परिणाम है?
यदि यही तर्क हर क्षेत्र में लागू किया जाए, तो क्या रक्षा मंत्रालय को भी सेना, नौसेना और वायुसेना विभागों में अलग-अलग बांट देना चाहिए? क्या विदेश मंत्रालय को भी क्षेत्रवार विभाजित कर देना चाहिए? स्पष्ट है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में सरकारें समन्वय और एकीकृत निर्णय क्षमता को प्राथमिकता देती हैं, लेकिन आर्थिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में अक्सर मंत्रालयों का अत्यधिक विभाजन देखने को मिलता है।
अत्यधिक मंत्रालय बनने से सबसे बड़ी समस्या समन्वय और जवाबदेही की पैदा होती है। जब एक ही विषय कई मंत्रालयों में बंट जाता है, तब निर्णय प्रक्रिया जटिल हो जाती है। फाइलें एक विभाग से दूसरे विभाग तक घूमती रहती हैं और नीतिगत फैसलों में अनावश्यक देरी बढ़ जाती है। कई बार किसी परियोजना को लागू करने में महीनों इसलिए लग जाते हैं क्योंकि अलग-अलग मंत्रालयों के बीच सहमति बनाना कठिन हो जाता है।
प्रधानमंत्री कार्यालय और कैबिनेट सचिवालय का बड़ा समय भी इसी अंतर-मंत्रालयी समन्वय में खर्च होता है। कई बार विशेष समन्वय समितियां या सलाहकार निकाय केवल इसलिए बनाने पड़ते हैं ताकि विभिन्न मंत्रालयों के बीच तालमेल बैठाया जा सके। परिणाम यह होता है कि जो काम स्पष्ट जिम्मेदारी और सीमित प्रशासनिक ढांचे में दो सप्ताह में हो सकता था, वही महीनों तक लंबित रहता है।
यदि वर्तमान व्यवस्था में ही समन्वय की स्थिति इतनी जटिल है, तो भविष्य में 120 से अधिक मंत्रियों और बड़ी संख्या में मंत्रालयों के साथ शासन व्यवस्था कितनी बोझिल हो सकती है, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। यह केवल राजनीतिक संतुष्टि का विषय नहीं, बल्कि प्रशासनिक दक्षता और सुशासन से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।
इस स्थिति का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू क्षमता और दक्षता से जुड़ा है। क्या किसी भी प्रधानमंत्री के लिए 127.5 ऐसे सांसदों को खोजना आसान होगा, जिनके पास प्रभावी मंत्री बनने की प्रशासनिक समझ, नीतिगत दृष्टि और शासन का अनुभव हो? चुनाव जीतना और कुशल प्रशासक साबित होना दोनों अलग-अलग बातें हैं। यही कारण है कि कई बार सरकारों को अनुभवी नौकरशाहों या विशेषज्ञ पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपनी पड़ती हैं।
राजनीतिक दलों के सामने कई बार सहयोगी संगठनों और दबाव समूहों को संतुष्ट करने की मजबूरी भी होती है। लेकिन यदि मंत्रिमंडल केवल राजनीतिक संतुलन का माध्यम बन जाए, तो उसका सीधा असर शासन की गुणवत्ता पर पड़ता है। अंततः जनता सरकार का मूल्यांकन उसके आकार से नहीं, बल्कि उसकी कार्यक्षमता और निर्णय क्षमता से करती है।
इसलिए भविष्य में लोकसभा की संख्या बढ़ने के साथ यह बहस और महत्वपूर्ण हो जाएगी कि क्या मंत्रियों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ाई जानी चाहिए, या फिर मंत्रालयों को पुनर्गठित कर अधिक समन्वित और प्रभावी प्रशासनिक ढांचा तैयार किया जाना चाहिए। मंत्रियों की अधिकतम सीमा 15 प्रतिशत से घटाने पर भी विचार होना चाहिए, ताकि सरकारें अधिक कॉम्पैक्ट और जवाबदेह बन सकें।
लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है, लेकिन सुशासन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। यदि प्रशासनिक ढांचा अत्यधिक विशाल और बिखरा हुआ हो जाए, तो निर्णय प्रक्रिया धीमी पड़ना स्वाभाविक है। आने वाले वर्षों में भारत की लोकतांत्रिक और प्रशासनिक संरचना के सामने यह एक गंभीर चुनौती बनने वाली है कि राजनीतिक संतुलन और प्रभावी शासन के बीच सही संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।