राजस्थान हाई कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत स्थायी भरण-पोषण निधि को स्वतंत्र अधिकार मानते हुए 25 लाख से बढ़ाकर 40 लाख रुपए किया। न्यायालय ने पत्नी की संपन्नता और बच्चों की आय को आधार न मानने का निर्णय दिया।
09 अप्रैल, जयपुर
राजस्थान उच्च न्यायालय की युगल पीठ—न्यायमूर्ति अरुण मोंगा एवं न्यायमूर्ति योगेन्द्र कुमार पुरोहित—ने एस.के. बनाम एन.एस. की याचिका में हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधान 25 की विवेचना करते हुए निर्णय दिया कि विवाह विच्छेद के प्रकरणों के अंतिम निराकरण में स्थायी भरण-पोषण निधि का निर्धारण करते समय पत्नी की आय, योग्यता अथवा उसके बच्चों की आय के आधार पर आकलन नहीं किया जाएगा। हिंदू विवाह अधिनियम में धारा 25 स्थायी भरण-पोषण राशि निर्धारित करने का स्वतंत्र अधिकार प्रदान करती है।
याचिका के संक्षिप्त तथ्यों के अनुसार, पत्नी ने विवाह उपरांत पति पर दहेज की मांग, क्रूरता और शारीरिक उत्पीड़न के आरोप लगाते हुए धारा 13(ए) हिंदू विवाह अधिनियम के तहत परिवार न्यायालय में विवाह विच्छेद का आवेदन दायर किया। परिवार न्यायालय ने 29 अगस्त 2025 को विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करते हुए 25 लाख रुपए की संपूर्ण स्थायी भरण-पोषण निधि देने का आदेश दिया था।
परिवार न्यायालय के निर्णय को पति और पत्नी दोनों ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी। पति का कहना था कि पत्नी शिक्षित और संपन्न है तथा उसके साथ उसके बच्चे रह रहे हैं, जो अच्छे वेतन पर नियोजित हैं, इसलिए पत्नी को जीवन-निर्वाह का कोई संकट नहीं है और 25 लाख रुपए स्थायी भरण-पोषण निधि देना विधिसम्मत नहीं है।
वहीं, पत्नी का तर्क था कि उसका पति सरकारी चिकित्सा अधिकारी है, जिसका लगभग 2 लाख रुपए मासिक वेतन है, लंबी शासकीय सेवा है और करोड़ों की अचल संपत्ति है, इसलिए 25 लाख रुपए की स्थायी भरण-पोषण निधि कम है और उसे अधिक राशि मिलनी चाहिए थी।
उच्च न्यायालय की युगल पीठ ने निर्णय दिया कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 का प्रावधान 25 पत्नी की स्थायी भरण-पोषण राशि निर्धारित करने से संबंधित है। इसमें विवाह विच्छेद के समय स्थायी निर्वाह निधि देने का आकलन पत्नी की हैसियत, शिक्षा और संपन्नता के आधार पर नहीं किया जा सकता। यदि बच्चे पत्नी के साथ निवास कर रहे हैं और अच्छे वेतन पर नियोजित हैं, तो इस आधार पर भी उसे स्थायी भरण-पोषण राशि से वंचित नहीं किया जा सकता।
युगल पीठ ने पति की याचिका निरस्त करते हुए तथा पत्नी की याचिका स्वीकार करते हुए परिवार न्यायालय के निर्णय में दी गई 25 लाख रुपए की स्थायी भरण-पोषण राशि को बढ़ाकर 40 लाख रुपए कर दिया।