अमेरिका, 25 मई।
अमेरिका में केवल जन्म से नागरिकता प्राप्त व्यक्तियों को संसद सदस्य बनाए जाने से जुड़े प्रस्ताव ने देश की राजनीति में गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। इस संवैधानिक संशोधन को रिपब्लिकन सांसद नैन्सी मेस ने प्रस्तुत किया है, जिस पर डेमोक्रेटिक खेमे ने कड़ा विरोध जताते हुए इसे विभाजनकारी और नस्लीय मानसिकता से प्रेरित बताया है। भारतीय मूल के कई जनप्रतिनिधियों ने भी इसे प्रवासी समुदाय के अधिकारों पर सीधा प्रहार करार दिया है।
अमेरिका स्वयं को प्रवासियों का देश मानता रहा है और इसकी पहचान स्वतंत्रता की उस प्रतिमा से जुड़ी है, जिस पर संदेश अंकित है कि दुनिया भर से आए थके-हारे और अवसर की तलाश में आए लोगों का यहां स्वागत है। इसी ऐतिहासिक पहचान के बीच अब ऐसा प्रस्ताव सामने आया है, जो इस मूल भावना पर प्रश्न खड़ा कर रहा है। प्रस्ताव के अनुसार, केवल वही व्यक्ति कांग्रेस का सदस्य बन सकेगा, जो अमेरिका में जन्मा हो।
वर्तमान संविधान के अनुसार प्रतिनिधि सभा और सीनेट के लिए नागरिकता की न्यूनतम अवधि और आयु की शर्तें निर्धारित हैं, जिनमें जन्मजात और प्राकृतिक दोनों नागरिक शामिल होते हैं। लेकिन नए संशोधन में इस परिभाषा को बदलकर केवल जन्म आधारित नागरिकता को ही पात्रता का आधार बनाने की बात कही गई है। प्रस्ताव के अनुसार विदेश में जन्मे और बाद में अमेरिकी नागरिक बने व्यक्ति सांसद, सीनेटर या उपराष्ट्रपति नहीं बन सकेंगे, हालांकि राष्ट्रपति पद के लिए पहले से ही यह शर्त लागू है।
प्रस्ताव रखने वाली सांसद का कहना है कि जब राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के लिए जन्म आधारित नागरिकता अनिवार्य है तो संसद के लिए भी समान मानक होना चाहिए। उनके अनुसार, सांसद राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों और गोपनीय सूचनाओं का हिस्सा होते हैं, इसलिए यह बदलाव आवश्यक है। कुछ रूढ़िवादी विचार समूह भी दोहरी नागरिकता और बाहरी प्रभाव को लेकर चिंता जता रहे हैं और इसे देशहित से जोड़कर देख रहे हैं।
इसके विपरीत डेमोक्रेटिक नेताओं ने इसे अमेरिकी लोकतंत्र और विविधता पर हमला बताया है। उनका कहना है कि अमेरिका की ताकत उसकी प्रवासी पृष्ठभूमि में निहित है, जिसने देश को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाया है। उन्होंने इतिहास का उदाहरण देते हुए कहा कि कई प्रमुख पदों पर प्रवासी मूल के लोग पहुंचे हैं और उन्होंने देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भारतीय मूल के कई सांसदों ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया है और इसे प्रवासी समुदाय के खिलाफ मानसिकता का प्रतीक बताया है। उनका कहना है कि यदि ऐसा कानून पहले से लागू होता तो आज कई प्रतिभाशाली लोग अमेरिकी राजनीति का हिस्सा नहीं बन पाते। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अमेरिका अपनी विविधता और प्रतिभा खोने का जोखिम उठा सकता है।
डेमोक्रेटिक पक्ष का आरोप है कि इस तरह के प्रस्ताव राजनीतिक लाभ के लिए सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देते हैं और कानूनी प्रवासियों को भी संदेह की दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति को मजबूत करते हैं।
भारतीय-अमेरिकी समुदाय में भी इस प्रस्ताव को लेकर चिंता देखी जा रही है, क्योंकि बड़ी संख्या में प्रवासी मूल के लोग अमेरिकी राजनीति में सक्रिय हैं। यदि यह संशोधन लागू होता है तो उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर सीधा असर पड़ सकता है।
संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार इस प्रस्ताव को पारित करना अत्यंत कठिन माना जा रहा है, क्योंकि इसके लिए व्यापक बहुमत और राज्यों की मंजूरी आवश्यक होती है, जो वर्तमान परिस्थितियों में लगभग असंभव माना जा रहा है।
इसके बावजूद इस बहस ने अमेरिका में एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या देश केवल जन्म आधारित नागरिकता तक सीमित रहेगा या फिर प्रवासियों के योगदान को अपनी पहचान का हिस्सा बनाए रखेगा।







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