नई दिल्ली, 29 मई।
दुनिया की भू-राजनीति एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रही है, जहां पुरानी मित्रताएं पुनर्परिभाषित हो रही हैं और नए सामरिक समीकरण तेजी से आकार ले रहे हैं। एशिया में यह परिवर्तन सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। एक ओर चीन अपनी आर्थिक और सामरिक ताकत के बल पर क्षेत्रीय दबदबा बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी ओर अमेरिका की विदेश नीति में बढ़ती अनिश्चितता उसके पारंपरिक सहयोगियों को असहज कर रही है। इस पूरी उथल-पुथल के केंद्र में भारत भी खड़ा है, जिसे अमेरिका लंबे समय से चीन के संतुलनकारी साझेदार के रूप में देखता रहा है। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के बाद वॉशिंगटन की प्राथमिकताओं और व्यवहार में आए बदलावों ने नई दिल्ली में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की हालिया भारत यात्रा इसी बेचैनी को कम करने का प्रयास थी। कोलकाता में धार्मिक कार्यक्रमों से लेकर नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात और जयपुर में सांस्कृतिक आयोजनों तक, यह दौरा केवल कूटनीतिक नहीं बल्कि प्रतीकात्मक भी था। अमेरिकी प्रशासन यह संदेश देना चाहता था कि भारत-अमेरिका संबंध अब भी मजबूत हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि दोनों देशों के रिश्तों में पहले जैसी सहजता फिलहाल दिखाई नहीं देती।
पिछले दो दशकों में भारत-अमेरिका संबंधों में लगातार मजबूती आई थी। रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी, क्वाड जैसे मंच और इंडो-पैसिफिक रणनीति इस रिश्ते की नई पहचान बने। लेकिन ट्रंप की नई नीतियों ने इस निरंतरता को झटका दिया है।
सबसे बड़ा विवाद व्यापार और टैरिफ को लेकर सामने आया। ट्रंप प्रशासन ने भारतीय निर्यात पर सख्त शुल्क लगाए, जिससे भारत में यह धारणा बनी कि अमेरिका अब रणनीतिक साझेदारी से अधिक अपने तात्कालिक आर्थिक हितों को महत्व दे रहा है। इसके साथ ही ट्रंप द्वारा पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर के प्रति दिखाई गई नरमी और पाकिस्तान को ईरान संकट में मध्यस्थ की भूमिका देना भारत के लिए असहज संकेत माना गया।
भारतीय रणनीतिक समुदाय में इस बदलाव की तुलना पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के दौर से की जा रही है, जब चीन के साथ संबंध सुधारने के लिए पाकिस्तान का उपयोग किया गया था। आज ट्रंप की चीन और पाकिस्तान नीति को उसी दृष्टि से देखा जा रहा है। अंतर केवल इतना है कि इस बार भारत पहले से अधिक मजबूत स्थिति में है।
उधर एशिया के अन्य देशों में भी अमेरिका को लेकर भरोसे का संकट बढ़ रहा है। जापान और दक्षिण कोरिया, ऐतिहासिक मतभेदों के बावजूद, अब एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। चीन की बढ़ती आक्रामकता और अमेरिकी अनिश्चितता ने उन्हें क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने पर मजबूर किया है। जापान अब “फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक” रणनीति को और मजबूत कर रहा है और क्षेत्रीय साझेदारियों पर जोर दे रहा है।
चीन की रणनीति भी इस दौरान और आक्रामक हुई है। रूस के साथ उसके बढ़ते संबंध और शी जिनपिंग की सक्रिय कूटनीति यह संकेत देती है कि बीजिंग वैश्विक शक्ति संतुलन को नए ढांचे में ढालने की कोशिश कर रहा है।
ऐसे समय में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने की है। भारत न तो किसी गुट का औपचारिक हिस्सा बनना चाहता है और न ही चीन के दबाव को स्वीकार करना चाहता है। यही कारण है कि नई दिल्ली बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत करती है।
भारत को यह भी समझना होगा कि केवल बाहरी साझेदारियों पर निर्भर रहकर दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला पर ध्यान देना आवश्यक है।
आज की दुनिया में स्थायी मित्रता से अधिक महत्वपूर्ण स्थायी राष्ट्रीय हित हैं, और भारत की विदेश नीति इसी दिशा में आगे बढ़ रही है।










