मध्यप्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में गंभीर प्रशासनिक अव्यवस्था और कर्मचारियों के असहयोग के कारण विश्वविद्यालय संचालन प्रभावित होने पर कुलगुरु द्वारा मुख्यमंत्री से मदद मांगने की स्थिति सामने आई है।
11 मई।
मध्यप्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था को लेकर अक्सर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। नई शिक्षा नीति, डिजिटल विश्वविद्यालय, शोध और गुणवत्ता की बातें मंचों से गूंजती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत क्या है, इसका भयावह उदाहरण तब सामने आता है जब किसी विश्वविद्यालय का कुलगुरु अपने ही कर्मचारियों से परेशान होकर मुख्यमंत्री से मदद मांगने पर मजबूर हो जाए। यदि यह मामला पूरी तरह सत्य है, तो यह केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं, बल्कि पूरे उच्च शिक्षा तंत्र की विफलता का जीवंत प्रमाण है।
जिस विश्वविद्यालय में कुलगुरु स्वयं को असहाय महसूस करे, जहां रजिस्ट्रार और अधीनस्थ कर्मचारी आदेशों को नजरअंदाज करें, जहां बैठकों में विरोध प्रदर्शन कर कार्य परिषद को बाधित किया जाए, वहां शिक्षा नहीं बल्कि अराजकता पलती है। सवाल यह है कि आखिर विश्वविद्यालयों में प्रशासन चला कौन रहा है — कुलगुरु, शासन या कर्मचारी संघ?
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय की स्थिति यदि वास्तव में ऐसी है कि कुलगुरु को कर्मचारियों से सहयोग नहीं मिल रहा, रिक्त पदों की जानकारी तक उपलब्ध नहीं कराई जा रही, आदेशों की अवहेलना हो रही है और बैठकें बाधित की जा रही हैं, तो यह किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की बीमारी है। विश्वविद्यालयों में वर्षों से पनपी बेलगाम कर्मचारी राजनीति अब प्रशासन पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है।
सबसे गंभीर बात यह है कि कुलगुरु ने कथित रूप से कई बार जानकारी मांगी, आदेश दिए, यहां तक कि कर्मचारी संघ से लिखित स्पष्टीकरण तक चाहा, लेकिन फिर भी स्थिति जस की तस बनी रही। इसका अर्थ साफ है — या तो प्रशासनिक अनुशासन पूरी तरह खत्म हो चुका है या फिर कुछ लोगों को ऐसा राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है कि उन्हें किसी कार्रवाई का भय ही नहीं।
विश्वविद्यालयों में कर्मचारी संघों की भूमिका कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा तक सीमित होनी चाहिए, लेकिन जब यही संगठन प्रशासनिक फैसलों को प्रभावित करने लगें, बैठकों को बाधित करें और संस्थान की कार्यप्रणाली को बंधक बना लें, तब यह लोकतंत्र नहीं बल्कि दबाव और ब्लैकमेल की राजनीति कहलाती है। यदि कोई अपंजीकृत संगठन विश्वविद्यालय संचालन में हस्तक्षेप कर रहा है, तो यह सीधे-सीधे नियमों और कानूनों का मजाक है।
लेकिन केवल कर्मचारी संघों को दोष देकर शासन और उच्च शिक्षा विभाग अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। सबसे बड़ा प्रश्न उच्च शिक्षा मंत्री, उच्च शिक्षा आयुक्त और विभागीय अधिकारियों पर खड़ा होता है। यदि कुलगुरु को मुख्यमंत्री तक जाना पड़ रहा है, तो इसका मतलब यह है कि विभागीय स्तर पर उनकी सुनवाई नहीं हुई। क्या मंत्री और विभाग केवल समारोहों में भाषण देने के लिए हैं? क्या विश्वविद्यालयों की अंदरूनी अराजकता पर उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं?
यह स्थिति बताती है कि विश्वविद्यालयों में जवाबदेही लगभग समाप्त हो चुकी है। कुलगुरु को प्रशासनिक अधिकार तो दिए जाते हैं, लेकिन जब उन अधिकारों को लागू कराने की बारी आती है, तब पूरा सिस्टम मौन हो जाता है। यही कारण है कि विश्वविद्यालयों में फाइलें रुकती हैं, नियुक्तियां विवादों में फंसती हैं, परीक्षा परिणाम देर से आते हैं और छात्र परेशान होते हैं।
सबसे दुखद पहलू यह है कि इस पूरे संघर्ष में सबसे बड़ा नुकसान विद्यार्थियों का होता है। लाखों छात्र अपने भविष्य की उम्मीद लेकर विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेते हैं, लेकिन उन्हें मिलता क्या है — अव्यवस्था, राजनीति, गुटबाजी और प्रशासनिक संघर्ष। जिन संस्थानों को ज्ञान का केंद्र होना चाहिए था, वहां शक्ति प्रदर्शन और दबाव की संस्कृति हावी होती जा रही है।