नई दिल्ली, 13 अप्रैल।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य में नाकाबंदी की योजना को लेकर नाटो सहयोगी देशों ने अलग रुख अपनाते हुए इसमें शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है। इन देशों ने कहा है कि वे इस संघर्ष में प्रत्यक्ष भागीदारी के बजाय केवल तब हस्तक्षेप करेंगे जब लड़ाई समाप्त हो जाएगी, जिससे अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच तनाव और बढ़ने की संभावना है।
ट्रंप ने दावा किया था कि अमेरिकी सेना अन्य देशों के साथ मिलकर इस समुद्री मार्ग पर सभी नौवहन गतिविधियों को रोकने का काम करेगी। यह कदम ईरान के साथ छह सप्ताह से जारी संघर्ष को समाप्त करने के लिए सप्ताहांत में हुई वार्ता असफल रहने के बाद सामने आया। अमेरिकी सेना ने बाद में स्पष्ट किया कि नाकाबंदी केवल ईरानी बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों पर लागू होगी।
युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान ने इस महत्वपूर्ण जलमार्ग पर अपना नियंत्रण बढ़ाते हुए अधिकांश विदेशी जहाजों की आवाजाही सीमित कर दी है और इसे स्थायी नियंत्रण में लेने के प्रयास तेज कर दिए हैं, साथ ही टोल वसूली की संभावना भी जताई जा रही है।
ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कहा कि नाकाबंदी जल्द लागू होगी और इसमें अन्य देश भी शामिल होंगे।
हालांकि ब्रिटेन और फ्रांस सहित नाटो देशों ने इस सैन्य कार्रवाई से दूरी बनाते हुए कहा है कि उनका ध्यान इस जलमार्ग को फिर से खोलने पर है, जहां से दुनिया के लगभग एक-पांचवें तेल का परिवहन होता है।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि भारी दबाव के बावजूद उनका देश युद्ध में नहीं उलझेगा।
नाटो प्रमुख ने सदस्य देशों को संकेत दिया है कि ट्रंप निकट भविष्य में ठोस सहयोग चाहते हैं ताकि इस मार्ग को सुरक्षित किया जा सके।
फ्रांस ने ब्रिटेन सहित कई देशों के साथ मिलकर एक बहुराष्ट्रीय मिशन बनाने की पहल की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य समुद्री यातायात को बहाल करना है।
इस प्रस्तावित मिशन में लगभग 30 देश शामिल हो सकते हैं, जिनमें खाड़ी देश, भारत, ग्रीस, स्पेन, इटली, नीदरलैंड और स्वीडन जैसे देश भी शामिल हैं, और इसका उद्देश्य सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करना है।
ब्रिटेन ने जहाजों के बीमा प्रीमियम कम करने की दिशा में भी प्रयास शुरू किए हैं, जबकि तुर्की ने कहा है कि जलमार्ग को कूटनीति के माध्यम से ही खोला जाना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय बल बनाना जटिल होगा।








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