संपादकीय
10 Apr, 2026

आरोप-प्रत्यारोप के बीच टूटती मर्यादा चुनावी अखाड़े में स्तरहीन आरोप, बाद में माफी की परंपरा

चुनावी भाषणों की तीव्रता, प्रशासनिक निष्पक्षता और राजनीतिक विवादों को लेकर देशभर में बहस तेज है। विभिन्न राज्यों में ध्रुवीकरण और आरोप-प्रत्यारोप का माहौल लगातार गहराता जा रहा है।

10 अप्रैल।
पांच राज्यों के चुनाव में संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं की चुनावी भाषा मर्यादाएं तोड़ रही है। शिष्टता की सीमाएं तो पहले ही टूट गई थीं, अब तो गाली राजनीतिक कव्वाली बन गई है। संविधान की शपथ लेने वाले मुख्यमंत्री और मंत्री भी ऐसी भाषा और शब्दों का उपयोग कर रहे हैं, जो लोकतंत्र को शर्मिंदा कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट को बंगाल के मुख्य सचिव और डीजीपी को कोर्ट में बुलाकर डांटना पड़ रहा है। इसके बाद भी राज्य की मशीनरी राजनीतिकरण से बाज नहीं आ पा रही है। जजों को बंधक बनाया जा रहा है। चुनाव आयोग भले ही कुछ अफसरों का ट्रांसफर कर दे, लेकिन जब पूरी प्रशासनिक हवा ही राजनीतिक प्रदूषण का शिकार हो गई है, तो ऐसी मशीनरी से निष्पक्षता की उम्मीद शायद संविधान को भी नहीं बची है।
बंगाल की सीएम ममता बनर्जी की पूरी राजनीति फायर ब्रांड रही है। बीजेपी से लड़ते-लड़ते वह अदालत और संविधान से भी टकराती नजर आती हैं। संघ और राज्य के संवैधानिक विभाजन की परवाह भी नहीं की जा रही है। चुनाव आयोग के खिलाफ उनका आक्रामक रुख चुनाव परिणाम आने तक जारी रहता है। सारे आरोप चुनाव के बाद स्वतः समाप्त हो जाते हैं। एसआईआर पर हो-हल्ला भी केवल समर्थक मतों के ध्रुवीकरण के लिए किया जा रहा है। अब तो ममता बनर्जी यह भी आरोप लगा रही हैं कि केंद्रीय सुरक्षाबल राज्य के लोगों के खिलाफ काम कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट और कोलकाता हाई कोर्ट को एसआईआर की प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप करना पड़ा। इसके लिए जजों की नियुक्ति करनी पड़ी। इन जजों के खिलाफ भी आंदोलन किए गए और उन्हें बंधक बनाया गया। हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मुख्य सचिव को जजों को सुरक्षा देने के लिए फोन करते रहे, लेकिन उनका फोन रिसीव नहीं किया गया। यह सब सत्ता पाने की होड़ में हो रहा है।
असम में भी तुष्टिकरण और ध्रुवीकरण का खुला खेल चल रहा है। वहां के सीएम की भाषा भी गाली-गलौज तक पहुंच गई है। आरोप लोकतांत्रिक हथियार है, लेकिन यदि इसके लिए षड्यंत्र का सहारा लिया जाए, तो प्रतिक्रिया भी उसी स्तर की होती है। कांग्रेस के मीडिया प्रभारी पवन खेड़ा ने असम के सीएम की पत्नी के खिलाफ आरोप लगाया, जिसे झूठा बताते हुए एफआईआर दर्ज कराई गई। असम पुलिस पवन खेड़ा के घर पहुंची। वह घर पर नहीं मिले, लेकिन कानूनी प्रक्रिया पूरी की गई। असम में चुनावी प्रचार बंद हो चुका है, अब मतदान होना है। किसका नैरेटिव प्रभावी रहा, यह चुनाव परिणाम बताएंगे।
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे अनुभवी राजनेता हैं, फिर भी उनकी भाषा में तीखापन नजर आता है। वह आरएसएस और बीजेपी को जहरीला सांप बता रहे हैं। एक चुनावी सभा में उन्होंने कहा कि यहां बहुत से मुस्लिम बैठे हैं और कुरान में लिखा है कि नमाज पढ़ते समय भी यदि कोई जहरीला सांप दिखे, तो उसे मार देना चाहिए। उनकी यह भाषा राजनीतिक कुंठा के साथ-साथ तुष्टिकरण का प्रयास प्रतीत होती है।
हिंदुत्व की राजनीति का कांग्रेस विरोध करती है, लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए किसी भी सीमा तक जाने से नहीं रुकती। कांग्रेस का तुष्टिकरण का इतिहास ही उसके वर्तमान का बड़ा कारण प्रतीत होता है। इसके बावजूद पार्टी उसी दिशा में आगे बढ़ रही है। सुधार के लिए न चिंतन दिखता है, न विचार-विमर्श। जहां तक संघ और बीजेपी का सवाल है, दोनों संगठन वर्तमान में जिस शक्ति और सेवा भाव के साथ आगे बढ़ रहे हैं, वह कांग्रेस को पीछे धकेल रहा है। संघ 100 वर्ष का हो चुका है और बीजेपी केंद्र व अधिकांश राज्यों में सत्ता में है। जहां बीजेपी जीत का रिकॉर्ड बना रही है, वहीं कांग्रेस हार का सिलसिला झेल रही है।
ब्यूरोक्रेसी का राजनीतिकरण सभी राज्यों की समस्या बन चुका है। बंगाल जैसे राज्यों में, जहां दशकों से क्षेत्रीय दलों का प्रभाव रहा है, वहां राजनीतिक दल और प्रशासनिक तंत्र के बीच अंतर करना कठिन हो गया है। वामपंथी सरकार के बाद टीएमसी सरकार ने भी इसी शैली को अपनाया। ऐसे में बंगाल में राष्ट्रीय दलों की सरकार बनने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। हालांकि ओपिनियन पोल में अब भी टीएमसी को बढ़त बताई जा रही है और संभावना जताई जा रही है कि ममता बनर्जी एक बार फिर सत्ता में लौट सकती हैं।
वहां सीधी लड़ाई टीएमसी और बीजेपी के बीच है। मतदाताओं का विभाजन स्पष्ट दिखाई देता है—मुस्लिम मतदाता ममता बनर्जी के साथ और हिंदू मतदाता बीजेपी के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। मुस्लिम एक वोट बैंक के रूप में संगठित हैं, जबकि हिंदू समाज जातियों और अन्य वर्गों में विभाजित है।
गाली और नाटकीय हाव-भाव चुनावी सभाओं में ताली तो बटोरते हैं, लेकिन राजनेताओं की गरिमा को कम करते हैं। राजनेता अब प्रेरणा स्रोत नहीं रहे, उनकी मर्यादा भी क्षीण होती जा रही है। उनकी भाषा और आचरण तभी सुधरेंगे, जब ब्यूरोक्रेसी कानून के पक्ष में मजबूती से खड़ी होगी। चुनाव भले ही पैसे के बल पर जीते जा सकते हैं, लेकिन दिल जीतने वाले नेता अब इतिहास का विषय बनते जा रहे हैं।
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