10 अप्रैल।
मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला को लेकर चल रहा विवाद एक जटिल ऐतिहासिक, धार्मिक और कानूनी विमर्श का केंद्र बन चुका है। हाल ही में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता संस्था फ्रंट फॉर जस्टिस के वकील विष्णु शंकर जैन ने लगातार तीसरे दिन अपने तर्क प्रस्तुत किए। उनके तर्क मुख्यतः ऐतिहासिक दस्तावेजों, शपथपत्रों और पुरातात्विक साक्ष्यों पर आधारित रहे।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और दावों की प्रकृति में याचिकाकर्ता पक्ष का प्रमुख दावा यह है कि भोजशाला मूलतः एक प्राचीन हिंदू मंदिर है, जिसका निर्माण लगभग 1034 ईस्वी में हुआ था। उनका तर्क है कि 14वीं शताब्दी से पहले इस स्थल पर मस्जिद के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं मिलता। इसके समर्थन में मौला कमालुद्दीन समिति द्वारा प्रस्तुत शपथपत्रों में उल्लिखित पुस्तकों का हवाला दिया गया, जिन्हें स्वयं याचिकाकर्ता पक्ष अपने दावे के समर्थन में उपयोग कर रहा है। यह भी कहा गया कि मस्जिद के निर्माण में मंदिर से प्राप्त सामग्री का उपयोग किया गया, जिसे इस्लामी सिद्धांतों के विरुद्ध बताया गया है।
फोटोग्राफिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के तहत याचिका में प्रस्तुत फोटोग्राफ्स को महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में रखा गया। याचिकाकर्ता के अनुसार ये चित्र मंदिर वास्तुकला और प्रतीकों को दर्शाते हैं। उल्लेखनीय है कि प्रतिवादी पक्ष द्वारा इन फोटोग्राफ्स की प्रामाणिकता पर शपथपत्र में कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई गई। हालांकि न्यायिक प्रक्रिया में केवल फोटोग्राफ्स पर्याप्त नहीं होते; उनकी संदर्भात्मक व्याख्या और विशेषज्ञ परीक्षण भी आवश्यक होता है।
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 है, जो 15 अगस्त 1947 की स्थिति को यथावत बनाए रखने का प्रावधान करता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की भूमिका भी इस मामले में निर्णायक मानी जा रही है। अदालत में एएसआई सर्वेक्षण और उसके शपथपत्र पर विस्तृत चर्चा संभावित है। यह विवाद इतिहास, आस्था और कानून के संतुलन की एक महत्वपूर्ण परीक्षा बन गया है।




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