नई दिल्ली, 15 मई।
लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली में आचार्य दिनेश चंद्र जोशी की जन्म शताब्दी समारोह एवं राष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर उन्हें समर्पित एक स्मारक डाक टिकट जारी किया गया। इस कार्यक्रम का उद्घाटन संस्कृति मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा किया गया।
इस अवसर पर जारी डाक टिकट को संस्कृत विद्वत्ता और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में उनके योगदान की औपचारिक मान्यता बताया गया। इसके माध्यम से उनके जीवनभर किए गए कार्यों और ज्ञान परंपरा के संरक्षण व संवर्धन को राष्ट्रीय स्तर पर श्रद्धांजलि दी गई।
यह आयोजन विभिन्न शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संस्थानों के सहयोग से संपन्न हुआ, जिसमें एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भी आयोजन किया गया। इसमें संस्कृत भाषा, भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा में उनके योगदान पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।
इस अवसर पर यह जानकारी भी दी गई कि एक उच्च स्तरीय समिति द्वारा उनके सम्मान में वर्ष 2026 से 2027 तक देशभर में स्मृति कार्यक्रम, शैक्षणिक सेमिनार, सांस्कृतिक आयोजन, प्रदर्शनियां और आध्यात्मिक सभाएं आयोजित करने की मंजूरी दी गई है।
अधिकारियों ने कहा कि आचार्य जोशी का जीवन समर्पण और साधना का प्रतीक रहा है, जिन्होंने संस्कृत और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया।
कार्यक्रम में प्राचीन शिक्षा केंद्रों के ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि भारत की ज्ञान परंपरा पर हुए आघात केवल ग्रंथों पर नहीं बल्कि सांस्कृतिक चेतना पर भी प्रभाव डालते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि आचार्य जोशी का मानना था कि भारत की आध्यात्मिक पहचान को बनाए रखने के लिए संस्कृत का संरक्षण आवश्यक है और देशभक्ति उनके लिए एक पवित्र संकल्प था।
उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के कुलपति सहित कई विद्वान और शिक्षाविद उपस्थित रहे, जबकि संगोष्ठी में विभिन्न सत्रों के माध्यम से उनके योगदान के अलग-अलग पहलुओं पर शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।
तीन अकादमिक सत्रों में वैदिक संस्कृति, आध्यात्मिक परंपरा, तीर्थयात्रा संस्कृति, संस्कृत शिक्षा और भारतीय सांस्कृतिक विरासत में उनके योगदान पर विस्तार से चर्चा की गई।
कार्यक्रम में देशभर से आए विद्वानों, शोधकर्ताओं, शिक्षकों और विद्यार्थियों ने आचार्य जोशी के कार्यों की स्थायी प्रासंगिकता पर विचार साझा किए।




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