भोपाल और आसपास के क्षेत्रों में पराली जलाने से बढ़ते प्रदूषण और प्रशासनिक निष्क्रियता ने पर्यावरण और शासन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
07 मई।
भोपाल के आसपास का इलाका इन दिनों खेतों से उठते धुएं का स्थायी अड्डा बन गया है। राजगढ़, गुना, विदिशा, रायसेन, सीहोर और होशंगाबाद—ये जिले अब खेती के लिए नहीं, बल्कि पराली की आग और उससे पैदा होते प्रदूषण के लिए सुर्खियों में हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कानून मौजूद है, आदेश जारी हैं और खतरे स्पष्ट हैं, तब भी यह आग आखिर किसकी शह पर धधक रही है?
देश में पराली जलाना प्रतिबंधित है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने साफ निर्देश दिए हैं कि फसल अवशेष जलाने पर सख्त कार्रवाई की जाए। लेकिन हकीकत यह है कि इन निर्देशों की परवाह न किसानों को है, न प्रशासन को। फर्क सिर्फ इतना है कि किसान अपनी मजबूरी का हवाला देते हैं और प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेता है। नतीजा—धुआं, गर्मी और बढ़ता हुआ प्रदूषण।
राजधानी के आसपास ही नियमों की ऐसी खुली अनदेखी होना केवल विडंबना नहीं, बल्कि एक गंभीर संकेत है कि प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर पड़ चुका है। जहां से पूरे प्रदेश को संचालित किया जाता है, वहीं अगर कानून बेअसर हो जाए तो यह मानने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि व्यवस्था भीतर से खोखली हो रही है।
हर साल पराली जलाने का मौसम आता है और हर साल वही घिसा-पिटा सिलसिला दोहराया जाता है—बैठकें, चेतावनियां और फिर सन्नाटा। यह “औपचारिक सक्रियता और वास्तविक निष्क्रियता” का ऐसा खेल बन चुका है, जिसमें नुकसान सिर्फ जनता का हो रहा है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन ने इस समस्या को जानबूझकर सामान्य मान लिया है?
किसानों की मजबूरी अपनी जगह है—सीमित संसाधन, समय का दबाव और अगली फसल की तैयारी। ये सब उन्हें आसान रास्ता चुनने पर मजबूर करते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सरकार ने पराली प्रबंधन के लिए अनेक योजनाएं चलाई हैं। यदि ये योजनाएं जमीन पर नहीं दिख रहीं, तो यह सीधा संकेत है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी है।
इस लापरवाही का असर अब साफ नजर आने लगा है। पराली के धुएं से हवा में जहरीले कणों की मात्रा बढ़ रही है, जिससे सांस और दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति और भी खतरनाक है। ऊपर से तेज धूप और बदलते मौसम का अस्थिर मिजाज—यह सब मिलकर हालात को और गंभीर बना रहा है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस पूरे मामले में जवाबदेही का अभाव है। न तो किसी अधिकारी पर कार्रवाई की खबर है, न ही किसी ठोस निगरानी व्यवस्था का संकेत। क्या यह मान लिया जाए कि नियम केवल दिखावे के लिए हैं? अगर कानून का उल्लंघन करने पर कोई परिणाम नहीं होगा, तो उसका पालन क्यों किया जाएगा?
अब वक्त केवल बयानबाजी का नहीं, बल्कि निर्णायक कार्रवाई का है। प्रशासन को यह समझना होगा कि उसकी चुप्पी ही इस समस्या को बढ़ावा दे रही है। खेतों में आग लगाने वालों पर सख्त कार्रवाई के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों की भी जवाबदेही तय करनी होगी। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक सुधार केवल एक कल्पना बनकर रह जाएगा।
साथ ही किसानों को वास्तविक और सुलभ विकल्प देना भी जरूरी है। तकनीक, मशीनें और आर्थिक सहायता—ये सब तभी कारगर होंगे, जब वे समय पर और सही तरीके से किसानों तक पहुंचें। अन्यथा यह पूरा तंत्र केवल कागजी उपलब्धियों तक सीमित रह जाएगा।
यह सवाल केवल पराली का नहीं है; यह शासन की विश्वसनीयता का सवाल है। भोपाल के आसपास धधकती पराली यह साफ संदेश दे रही है कि अगर अब भी आंखें बंद रखी गईं, तो यह आग सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि व्यवस्था की साख को भी राख में बदल देगी।