कोलकाता, 19 मई ।
दक्षिण 24 परगना जिले की फलता विधानसभा सीट पर 21 मई को होने वाले पुनर्मतदान से महज दो दिन पहले तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार जहांगीर खान के अचानक चुनावी मुकाबले से हटने के फैसले ने राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव पैदा कर दिया है। अपने आक्रामक अंदाज और “पुष्पा झुकेगा नहीं” जैसी छवि के कारण चर्चा में रहे जहांगीर खान के इस कदम के बाद राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
संवाददाता सम्मेलन में जहांगीर खान ने घोषणा की कि वह पुनर्मतदान में हिस्सा नहीं लेंगे। उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री द्वारा फलता के विकास के लिए विशेष पैकेज की घोषणा के बाद उन्होंने यह निर्णय लिया है और स्वयं को क्षेत्र का “भूमिपुत्र” बताते हुए शांति एवं विकास को प्राथमिकता देने की बात कही।
हालांकि उनके इस फैसले के तुरंत बाद तृणमूल कांग्रेस ने सार्वजनिक रूप से उनसे दूरी बना ली और स्पष्ट किया कि चुनाव से हटने का निर्णय पूरी तरह व्यक्तिगत है तथा पार्टी का इससे कोई संबंध नहीं है।
पार्टी की ओर से आरोप लगाया गया कि चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद क्षेत्र में तृणमूल कार्यकर्ताओं के खिलाफ दमन की स्थिति बनी, जिसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी, पार्टी कार्यालयों में तोड़फोड़ और कई जगहों पर कब्जे जैसी घटनाएं सामने आईं।
तृणमूल कांग्रेस ने यह भी कहा कि विरोधी दल प्रशासन और एजेंसियों के माध्यम से राजनीतिक दबाव बना रहा है, हालांकि कठिन परिस्थितियों के बावजूद कार्यकर्ता मजबूती से डटे हुए हैं, जबकि कुछ लोग दबाव में झुकने को मजबूर हुए हैं।
इसी बीच विपक्षी नेता ने जहांगीर खान पर तीखा हमला करते हुए कहा कि वह मैदान छोड़कर भाग गए हैं और उन्हें पोलिंग एजेंट तक नहीं मिल पाए, जिसके कारण उन्होंने चुनावी मुकाबले से पीछे हटने का निर्णय लिया।
जहांगीर खान ने पहले पुलिस पर्यवेक्षक को चुनौती दी थी और खुद को किसी भी दबाव से न झुकने वाला बताया था, जबकि उनके समर्थक उन्हें “पुष्पा” जैसी छवि के रूप में प्रचारित कर रहे थे और विरोधी दल लगातार इस पर तंज कसते रहे।
फलता विधानसभा क्षेत्र पहले से ही विवादों में रहा है, जहां मतदान के दौरान कई अनियमितताओं के आरोप लगे थे, जिसके बाद पुनर्मतदान का आदेश दिया गया। यह सीट लंबे समय से राजनीतिक रूप से संवेदनशील मानी जाती रही है।
नाम वापसी की अंतिम समय सीमा समाप्त होने के कारण अब उनका नाम ईवीएम में बना रहेगा, लेकिन उनके हटने के ऐलान से चुनावी समीकरणों पर बड़ा मनोवैज्ञानिक असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।












