भोपाल, 15 सितंबर।
स्टेशन कभी सफर की शुरुआत का एहसास कराता था, अब वही जगह दहशत का स्टेशन बनती जा रही है। भोपाल समेत कई बड़े स्टेशनों पर यात्री अब ट्रेन का इंतजार नहीं, बल्कि चूहों से अपनी सुरक्षा का इंतजार कर रहे हैं। कभी यात्री की नाक कुतरने की खबर आती है, कभी सोते हुए बच्चे का पैर काटने की। कभी बैग कुतरकर कपड़े खराब करने की तो कभी खाने के पैकेट फाड़ने की। सोचिए, एक यात्री जो आरक्षण कराकर चादर ओढ़कर सोया है, उसके बगल से चूहा गुजर रहा है और रेलवे प्रशासन खड़ा देख रहा है। यह असुविधा का मामला नहीं रहा, यह अब गंभीर सवाल बनता जा रहा है। यह सवाल यात्रियों की सेहत से जुड़ा है, उनकी सुरक्षा से जुड़ा है और सबसे बढ़कर उस भरोसे से जुड़ा है, जो यात्री भारतीय रेल पर करता है।
रेलवे का दावा है कि वह विश्वस्तरीय सुविधाएं दे रही है, पर प्लेटफार्म पर घूमते चूहे उस दावे की सारी पोल खोल रहे हैं। चूहों का आतंक केवल खुले हिस्सों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन अंदरूनी स्थानों तक पहुंच गया है, जहां खाद्य सामग्री रखी जाती है। जहां खाद्य सामग्री खुली रहती है, वहां चूहे पहुंच रहे हैं और जहां खाद्य सामग्री ढकी है, वहां भी गंध से पहुंच रहे हैं। यदि यह स्थिति सही है तो रेलवे की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी, दोनों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
भोजन दूषित होने और संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ा हुआ है। कुछ दिन पहले मंगला एक्सप्रेस में खाने के बाद तीस बच्चों की तबीयत बिगड़ने की घटना सामने आई थी। बच्चों को उल्टी, दस्त और बुखार की शिकायत हुई थी, जबकि पांच बच्चों की हालत गंभीर बताई गई थी। वहीं, कुछ महीने पहले एग्जीक्यूटिव लाउंज में परोसे गए दाल-चावल में कीड़े मिलने की शिकायत भी सामने आई थी। ये घटनाएं अलग-अलग लगती हैं, पर इनका जोड़ एक ही जगह पर होता है और वह है लापरवाही। रेलवे के रेस्टोरेंट और खान-पान से जुड़े ठेकों की निगरानी कौन कर रहा है, यह बड़ा सवाल है।
पेस्ट एंड रोडेंट कंट्रोल का कागजी खेल भी सवालों के घेरे में है। भोपाल रेलवे स्टेशन के यार्ड में चूहों का आतंक खाने की जगहों तक पहुंचा है। पहले भी तबीयत बिगड़ने के मामले आ चुके हैं। चूहों की मौजूदगी को नजरअंदाज करना सेहत के साथ खिलवाड़ है। हर बड़े स्टेशन पर पेस्ट और रोडेंट कंट्रोल की अनुबंध व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह सवाल इसलिए भी बड़ा है, क्योंकि यह ठेका यात्रियों की सुरक्षा से सीधा जुड़ा है। अनुबंध की शर्तों में साफ लिखा है कि पेस्ट कंट्रोल के लिए संबंधित एजेंसी अनुबंध की शर्तों के मुताबिक काम नहीं कर रही है तो रेलवे की जिम्मेदारी तय होती है। मामलों में अनुबंध के प्रावधानों के तहत जुर्माना लगाने से लेकर अनुबंध समाप्त करने तक का प्रावधान हो सकता है। फिर लगातार चूहों का मेला लगने और इसके बावजूद व्यवस्था में सुधार न होने पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
यह सवाल इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि रेलवे के अधिकारी नियमित निरीक्षण का दावा कर रहे हैं। यदि कर रहे हैं तो चूहे दिख क्यों रहे हैं और यदि नहीं कर रहे हैं तो दावा क्यों किया जा रहा है?
सबसे दुखद बात यह है कि इस पूरे मामले में यात्री खुद को अकेला महसूस कर रहा है। उसकी शिकायत का कोई ठोस जवाब नहीं है। वह ट्वीट करता है, फोटो डालता है, पर अगले दिन फिर वही चूहा उसी बेंच के नीचे घूमता दिखता है। रेलवे प्रशासन असहाय नजर आ रहा है। कभी कहा जाता है कि ठेकेदार जिम्मेदार है, कभी कहा जाता है कि सफाई एजेंसी जिम्मेदार है। यात्री सोचता है कि टिकट उसने रेलवे से लिया है, ठेकेदार से नहीं, तो जवाबदेही रेलवे की होनी चाहिए।
वीआईपी लाउंज में भी चूहे घूमते नजर आ रहे हैं। ऐसे में खाद्य सामग्री के दूषित होने और संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है। यात्रियों का आरोप है कि एसी कोच में भी चूहे घुस रहे हैं और रात में चादर-कंबल कुतर रहे हैं। ऐसे में यात्री की नींद ही नहीं, उसकी सेहत भी खतरे में है। रेलवे को समझना होगा कि यात्री सिर्फ गंतव्य तक नहीं पहुंचना चाहता, बल्कि सुरक्षित पहुंचना चाहता है।
इस समस्या का हल केवल दवा छिड़कने से नहीं होगा। इसका हल व्यवस्था की सोच बदलने से होगा। पेस्ट कंट्रोल को कागज से निकालकर जमीन पर लागू किया जाए। हर स्टेशन पर हर हफ्ते ऑडिट हो और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक हो। खाद्य सामग्री के भंडारण को पूरी तरह से सील और सुरक्षित बनाया जाए। खुला खाना रखना बंद हो और कचरा प्रबंधन को सख्त किया जाए, क्योंकि चूहे वहीं आते हैं, जहां कचरा और खाना खुले में मिलता है। ठेकों में जवाबदेही तय हो। यदि चूहे मिलते हैं तो सिर्फ जुर्माना नहीं, बल्कि ठेका निरस्त करने की कार्रवाई हो।
सबसे जरूरी काम यह कि यात्री की शिकायत को गंभीरता से लिया जाए। एक ऐसा सिस्टम बने, जहां यात्री द्वारा भेजी गई फोटो या वीडियो पर चौबीस घंटे के अंदर कार्रवाई हो। रेलवे भारत की जीवन रेखा है और जीवन रेखा पर चूहों का इस तरह घूमना उस जीवन को ही खतरे में डालना है। यह समय है जब रेलवे को यह मानना होगा कि छोटा-सा चूहा भी बड़े सिस्टम की विश्वसनीयता को कुतर सकता है। यदि समय रहते नहीं चेते तो कल यही चूहे यात्रियों के भरोसे को भी कुतर जाएंगे।
















