भोपाल, 23 सितंबर।
यूपीआई ने भारतीय बाजार में भुगतान की तस्वीर बदल दी है। छोटी दुकान से लेकर बड़े शोरूम तक मोबाइल से भुगतान सामान्य व्यवहार बन चुका है। ऐसे समय में १५ अक्टूबर से २००० रुपये से अधिक के चुनिंदा व्यापारी भुगतान पर ०.४ प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लागू करने की व्यवस्था ने व्यापारियों की चिंता बढ़ाई है। मध्य प्रदेश में २३ सितंबर को ‘नो-यूपीआई दिवस’ का आह्वान इसी असंतोष का संकेत है।
व्यापारियों की आपत्ति का आधार समझना जरूरी है। कम लाभ वाले कारोबार में प्रत्येक लेन-देन की लागत बढ़ना मामूली बात नहीं है। किराना, सराफा, वाहन और अन्य क्षेत्रों में बड़ी राशि के भुगतान आम हैं। व्यापारी संगठनों को आशंका है कि अतिरिक्त लागत से कारोबार का खर्च और अंततः कीमतें बढ़ सकती हैं। इसलिए वे शून्य एमडीआर की मांग कर रहे हैं।
हालांकि यह स्पष्ट रहना चाहिए कि एमडीआर सीधे ग्राहक पर लगाया जाने वाला सरकारी कर नहीं है। नई व्यवस्था में २००० रुपये तक के व्यापारी भुगतान और व्यक्ति-से-व्यक्ति भुगतान पर शुल्क नहीं होगा। सरकार का तर्क है कि यह व्यवस्था यूपीआई के संचालन, सुरक्षा और विस्तार की लागत को टिकाऊ बनाने के लिए जरूरी है।
फिर भी नीति की सफलता इस बात से तय होगी कि व्यापारी इस लागत को कैसे वहन करते हैं। यदि लागत बढ़ने पर व्यापारी नकद भुगतान को प्राथमिकता देने लगें, तो डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के प्रयास प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर, सुरक्षित और टिकाऊ भुगतान व्यवस्था की लागत का प्रश्न भी वास्तविक है।
इसलिए समाधान टकराव में नहीं, संवाद में है। सरकार को छोटे व्यापारियों और कम-मार्जिन वाले कारोबार पर पड़ने वाले प्रभाव का आंकड़ों के आधार पर आकलन करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर शुल्क की दर और दायरे की समीक्षा हो सकती है।
यूपीआई की सबसे बड़ी ताकत उसकी सरलता और भरोसा है। डिजिटल भुगतान को आगे बढ़ाना है तो व्यापारी और ग्राहक, दोनों का विश्वास बनाए रखना होगा। ऐसी नीति ही टिकाऊ होगी जो डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार करे और छोटे व्यापारियों पर अनावश्यक बोझ भी न डाले।















