नई दिल्ली, 24 सितंबर।
एक समय था जब शौक का अर्थ ऐसी गतिविधि से था, जिसे करने के लिए किसी बाहरी कारण की जरूरत नहीं होती थी। किताब पढ़ना अच्छा लगता है तो पढ़िए, दौड़ना पसंद है तो दौड़िए, खाना बनाना अच्छा लगता है तो बनाइए या खाली समय में चित्र बनाइए। शौक का मूल्य इसी में था कि वह जीवन की व्यस्तता से थोड़ी देर बाहर निकालता था। लेकिन नई पीढ़ी के बीच शौक का एक नया रूप दिखाई दे रहा है। अब केवल कोई काम करना पर्याप्त नहीं है, उसे बेहतर करना, उसका हिसाब रखना, उसकी उपलब्धियां दर्ज करना और कई बार उन्हें दुनिया के सामने प्रदर्शित करना भी जरूरी महसूस होने लगा है। इस प्रवृत्ति को ‘हॉबीमैक्सिंग’ कहा जा रहा है।
हॉबीमैक्सिंग का मूल विचार आज की डिजिटल संस्कृति से निकलता है - समय का अधिकतम उपयोग, स्वयं को लगातार बेहतर बनाना और किसी भी गतिविधि को उपलब्धि में बदल देना। समस्या तब शुरू होती है, जब आराम के लिए चुना गया शौक भी लक्ष्य, आंकड़े और प्रदर्शन की कसौटी पर परखा जाने लगे। किताब पढ़ी तो कितनी पढ़ीं, फिल्म देखी तो कितनी देखीं, कितनी दौड़ लगाई, कितने व्यायाम किए, कितने रेस्तरां आजमाए - हर अनुभव के साथ एक संख्या जुड़ने लगी है।
डिजिटल माध्यमों ने इस प्रवृत्ति को और मजबूत किया है। ऐसी अनेक ऐप हैं, जिन पर लोग अपनी पढ़ी किताबों, देखी फिल्मों, खेले खेलों या आजमाए गए रेस्तरां का रिकॉर्ड रखते हैं। रिकॉर्ड रखना अपने आप में गलत नहीं है। कई लोगों के लिए यह अपनी रुचियों को व्यवस्थित करने या प्रगति समझने का उपयोगी तरीका हो सकता है। लेकिन जैसे ही संख्या स्वयं उद्देश्य बन जाती है, शौक का स्वभाव बदलने लगता है। जो काम आनंद के लिए शुरू किया था, वह धीरे-धीरे लक्ष्य पूरा करने की बाध्यता बन सकता है।
मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि जिस चीज को मापा जा सकता है, उसे बढ़ाने की कोशिश की जाए। इसलिए किसी शौक को आंकड़ों में बदलते ही व्यक्ति उस आंकड़े को बेहतर करने में जुट सकता है, भले ही उसका वास्तविक आनंद उससे जुड़ा न हो। यहीं अवकाश और काम के बीच की दूरी कम होने लगती है। किताब पढ़ना आत्मिक आनंद देने के बजाय पढ़ी गई किताबों की संख्या बढ़ाने का साधन बन जाता है। दौड़ना शरीर और मन को तरोताजा करने के बजाय समय, दूरी और गति सुधारने की प्रतियोगिता बन सकता है।
इस प्रवृत्ति का दूसरा पहलू सामाजिक प्रदर्शन है। सामाजिक माध्यमों पर दूसरों का जीवन लगातार हमारे सामने है। कोई सुबह व्यायाम कर रहा है, कोई किताबों की सूची साझा कर रहा है, कोई खाना बना रहा है और कोई अपने रचनात्मक काम की तस्वीरें डाल रहा है। धीरे-धीरे तुलना पैदा होती है कि दूसरे लोग हमसे ज्यादा कर रहे हैं और हमारा समय कहीं बेकार तो नहीं जा रहा। आराम करना अपराधबोध पैदा करने लगता है। खाली बैठना समय गंवाना लगता है और हर खाली घंटे को किसी सार्थक गतिविधि में बदलने की बेचैनी बढ़ती जाती है।
२३ वर्षीय शुभा पॉलिसेट्टी का अनुभव इस विरोधाभास को समझने में मदद करता है। उन्होंने अपने शौक को एक व्यक्तिगत पाठ्यक्रम की तरह व्यवस्थित किया, जिसमें समय-सीमा और लक्ष्य तय थे। उन्हें इससे प्रेरणा मिलती थी, लेकिन एक घंटे टेलीविजन देखने में निकल जाएं तो उन्हें लगता था कि उन्होंने कुछ उत्पादक नहीं किया। उनके लिए शौक आराम से अधिक चुनौती बन गए। खाना बनाने जैसी गतिविधि को कैमरे के सामने दर्ज करने की कोशिश में उन्हें लगा कि वास्तविक अनुभव का आनंद ही कम हो गया।
यही आज की डिजिटल जिंदगी का बड़ा विरोधाभास है। हम जीवन जी भी रहे हैं और उसी समय उसे दिखाने की तैयारी भी कर रहे हैं। किसी किताब को पढ़ने से अधिक महत्वपूर्ण यह लग सकता है कि उसके बारे में पोस्ट किया जाए। किसी रचनात्मक काम को करने से अधिक जरूरी यह लग सकता है कि लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे। धीरे-धीरे निजी आनंद सार्वजनिक मान्यता पर निर्भर होने लगता है।
कुछ युवाओं के लिए यह प्रवृत्ति प्रेरणा का माध्यम भी हो सकती है। लक्ष्य तय करना, अपनी प्रगति देखना और किसी गतिविधि में अनुशासन लाना जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। समस्या हॉबीमैक्सिंग के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उस मानसिकता में है जिसमें हर गतिविधि से परिणाम, उत्पादकता या मान्यता की अपेक्षा की जाने लगे। शौक यदि व्यक्ति को बेहतर महसूस कराता है तो वह उपयोगी है; उसके लिए प्रमाणपत्र जरूरी नहीं।
विडंबना यह है कि विश्राम भी अब उत्पादकता से जोड़ दिया गया है। आराम इसलिए करें ताकि अगले दिन बेहतर काम कर सकें। व्यायाम इसलिए करें ताकि प्रदर्शन सुधरे। पढ़ें ताकि ज्ञान बढ़े। रचनात्मक काम करें ताकि कुछ प्रकाशित या साझा किया जा सके। यानी ऐसा समय, जिसका कोई उद्देश्य नहीं होना चाहिए था, वह भी किसी उद्देश्य के अधीन हो गया है।
शायद हमें यह स्वीकार करने की जरूरत है कि हर अच्छी चीज का कोई माप होना जरूरी नहीं। कुछ किताबें केवल इसलिए पढ़ी जा सकती हैं क्योंकि वे अच्छी लगती हैं। कुछ दौड़ केवल इसलिए लगाई जा सकती हैं क्योंकि दौड़ते हुए मन हल्का होता है। कुछ भोजन केवल स्वाद के लिए बनाया जा सकता है और कुछ घंटे केवल इसलिए बिताए जा सकते हैं क्योंकि उस समय कुछ करना जरूरी नहीं।
शौक की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि वह जीवन को काम से अलग करता था। यदि हम उसे भी काम की तरह मापने और प्रदर्शित करने लगेंगे, तो आराम की वह जगह कहां बचेगी जहां व्यक्ति बिना किसी लक्ष्य के सिर्फ अपने लिए कुछ कर सके? आज की पीढ़ी के सामने चुनौती अधिक शौक ढूंढना नहीं, बल्कि अपने शौक को हर समय उपलब्धि में बदलने से बचाना है। कभी-कभी कुछ करना केवल इसलिए भी पर्याप्त है कि उसे करते हुए अच्छा लगता है।















