जम्मू-कश्मीर, 24 सितंबर।
जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में इन दिनों जो दृश्य देखने को मिल रहा है, वह लोकतंत्र के मंदिर की गरिमा को ठेस पहुंचाता है। सदन के अंदर मेजें पीटी जा रही हैं, नारेबाजी हो रही है, कागज फाड़े जा रहे हैं और बाहर जनता अपनी ही समस्याओं में उलझी हुई है। जिस सदन से उम्मीद थी कि बिजली, पानी, सड़क, रोजगार और महंगाई पर चर्चा होगी, वहीं अब केवल आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। जनता ने बड़े उत्साह के साथ वर्षों बाद अपने प्रतिनिधियों को चुनकर भेजा था, पर वही जनता आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। विधानसभा का सत्र शुरू होते ही हंगामा शुरू हो जाता है। सत्ता पक्ष विपक्ष पर आरोप लगाता है और विपक्ष सत्ता पक्ष को घेरने में लगा रहता है। बीच में कहीं जनता की आवाज दब जाती है।
जम्मू में स्मार्ट मीटर का मुद्दा हो या कश्मीर में सेब किसानों की परेशानी, युवा बेरोजगारों की फौज हो या दिहाड़ी मजदूरों की मजबूरी, महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर चर्चा नहीं होती। सदन की कार्यवाही कभी स्थगित हो जाती है तो कभी वाकआउट में खत्म हो जाती है और टीवी पर केवल शोर की तस्वीरें दिखती हैं। जनता आहत है, पर नेता मस्त हैं। जम्मू की गलियों में जाइए तो लोग पूछते हैं कि हमने वोट किसलिए दिया था। कश्मीर के गांव में जाइए तो किसान पूछता है कि उसकी फसल का दाम कौन तय करेगा। श्रीनगर के नौजवान के हाथ में डिग्री है, पर नौकरी नहीं है। उधमपुर के दुकानदार को बिजली बिल ने तोड़ दिया है। राजौरी-पुंछ के सीमांत गांव में आज भी सड़क नहीं है, अस्पताल नहीं है। सवालों का जवाब विधानसभा में नहीं मिलता।
राजनीतिक दल अपने एजेंडे में व्यस्त हैं। कोई अनुच्छेद 370 की बात को फिर जिंदा करना चाहता है, कोई परिसीमन पर राजनीति कर रहा है, कोई केवल कुर्सी के गणित में उलझा है। जनसमस्याओं की उपेक्षा इस स्तर पर है कि जनता को लगता है कि उसके मुद्दे किसी के घोषणा पत्र में ही नहीं हैं। पिछले कुछ महीनों में बिजली संकट गहराया है। स्मार्ट मीटर को लेकर जम्मू में बड़ा विरोध हुआ। कश्मीर में सर्दियों से पहले ही बिजली कटौती शुरू हो गई। पानी की सप्लाई अनियमित है। बेरोजगारी दर देश में सबसे अधिक वाले राज्यों में है, पर इन सब पर सदन में पांच मिनट भी चर्चा नहीं होती। हंगामा इस तरह हावी है कि जरूरी विधेयक भी बिना बहस के पास हो रहे हैं।
इन सबके बीच एक मांग, जो पूरे जम्मू-कश्मीर में सबसे अधिक गूंज रही है, वह है पूर्ण राज्य का दर्जा। पांच अगस्त 2019 को जब जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था, तब कहा गया था कि यह अस्थायी व्यवस्था है और जल्द ही पूर्ण राज्य का दर्जा वापस दिया जाएगा। प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक ने कई बार कहा कि राज्य का दर्जा वापस मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार से इस पर विचार करने को कहा था। आज तक इस पर कोई ठोस तारीख नहीं आई और इसी कारण जनता में असंतोष बढ़ रहा है। लोगों को लगता है कि केंद्र शासित प्रदेश में उनकी सुनवाई नहीं होती, अफसरशाही हावी है और चुनी हुई सरकार के पास पूरी शक्तियां नहीं हैं। विधायक कहते हैं कि उनके पास ट्रांसफर तक का अधिकार नहीं है और जनता कहती है कि उनके विधायक के पास कोई ताकत ही नहीं है। पूर्ण राज्य का दर्जा केवल एक प्रशासनिक मांग नहीं है। यह जम्मू-कश्मीर के लोगों के आत्मसम्मान की मांग है। यह उनके विश्वास की मांग है। जब तक पूर्ण राज्य नहीं मिलेगा, तब तक निवेश नहीं आएगा, बड़े उद्योग नहीं लगेंगे और युवाओं को रोजगार नहीं मिलेगा, क्योंकि उद्योगपति भी ऐसी जगह निवेश करने से बचते हैं, जहां शासन व्यवस्था अस्थिर हो।
विधानसभा में हंगामे से फायदा किसका हो रहा है, इसका सीधा जवाब है—किसी का नहीं। नुकसान केवल जनता का हो रहा है। सदन चलता है तो जनता के पैसे से चलता है। एक मिनट की कार्यवाही पर लाखों रुपये खर्च होते हैं और यदि वह मिनट हंगामे में बर्बाद हो जाए तो वह जनता की जेब पर डाका है। राजनीतिक दलों को समझना होगा कि जनता अब बहुत जागरूक है। वह सोशल मीडिया पर सब देखती है। वह जानती है कि कौन जनहित में बोल रहा है और कौन केवल कैमरे के लिए चिल्ला रहा है। यदि यही स्थिति रही तो आने वाले चुनाव में जनता हंगामा करने वालों को ही सदन से बाहर कर देगी।
जम्मू-कश्मीर के लोग शांति चाहते हैं, विकास चाहते हैं और अपना हक चाहते हैं। उन्होंने बंदूक का दौर देखा है, पत्थरबाजी का दौर देखा है और अब वे केवल काम चाहते हैं। सबसे पहले विधानसभा में हंगामा बंद होना चाहिए और जनसमस्याओं पर चर्चा के लिए एक न्यूनतम एजेंडा तय होना चाहिए। बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार पर रोजाना एक घंटा तय किया जाए और उस पर बिना किसी शोर के बात हो। पूर्ण राज्य के दर्जे पर केंद्र को स्पष्ट समय-सीमा देनी चाहिए। यह कहना पर्याप्त नहीं है कि उचित समय पर दर्जा देंगे। उचित समय कब आएगा, यह बताना होगा। और जब तक दर्जा नहीं मिलता, तब तक चुनी हुई सरकार को अधिक शक्तियां देनी होंगी, ताकि विधायक जनता के काम करा सकें।
राजनीतिक दलों को अपने घोषणा पत्रों पर वापस लौटना होगा। उन्होंने जनता से जो वादे किए थे, वे वादे पूरे करने होंगे। यदि स्मार्ट मीटर का विरोध किया था तो उसका समाधान निकालना होगा। यदि रोजगार का वादा किया था तो भर्तियां निकालनी होंगी। यदि सेब किसानों को एमएसपी का वादा किया था तो उसे देना होगा। जम्मू-कश्मीर की जनता बहुत धैर्यवान है। उसने बहुत कुछ सहा है। अब वह सहना नहीं चाहती। वह जीना चाहती है और जीने के लिए उसे शोर नहीं, बल्कि सदन में गंभीरता चाहिए। हंगामे की जगह काम चाहिए और केंद्र शासित प्रदेश की जगह पूर्ण राज्य का सम्मान चाहिए।
















