श्रीनगर, 24 सितंबर।
डिजिटल तकनीक ने जीवन को आसान और तेज बनाया है। मोबाइल बैंकिंग, यूपीआई, ऑनलाइन खरीदारी और डिजिटल सेवाएं आज रोजमर्रा की जरूरत बन चुकी हैं। लेकिन सुविधा के साथ साइबर जोखिम भी बढ़ा है। साइबर ठग लोगों की तकनीकी जानकारी की कमी का फायदा उठाकर उनकी मेहनत की कमाई हड़प रहे हैं। ऐसे में जागरूकता ही साइबर अपराध से बचाव का सबसे बड़ा हथियार है।
जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों में यह चुनौती अधिक महत्वपूर्ण है, जहां दूरदराज के इलाकों में डिजिटल साक्षरता अभी समान रूप से नहीं पहुंची है। श्रीनगर में भारतीय रिजर्व बैंक का वित्तीय साक्षरता और साइबर सुरक्षा जागरूकता सम्मेलन इसी जरूरत को रेखांकित करता है। साइबर सुरक्षा अब केवल पुलिस या तकनीकी विशेषज्ञों का विषय नहीं, बल्कि बैंक, सरकार और नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है।
साइबर ठगी के तरीके लगातार बदल रहे हैं। कभी बैंक अधिकारी बनकर ओटीपी मांगा जाता है, कभी बिजली बिल या केवाईसी के नाम पर संदिग्ध लिंक भेजा जाता है। नौकरी, लॉटरी और सरकारी योजनाओं के नाम पर भी लोगों को निशाना बनाया जाता है। अनजान एप डाउनलोड करवाकर मोबाइल और निजी जानकारी हासिल करने की कोशिश भी होती है।
इससे बचने के लिए ओटीपी, पिन, पासवर्ड और बैंक संबंधी गोपनीय जानकारी किसी से साझा नहीं करनी चाहिए। संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने और अनजान एप डाउनलोड करने से बचना जरूरी है। धोखाधड़ी होने पर तुरंत बैंक को सूचना देकर साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 या साइबर क्राइम डॉट जीओवी डॉट इन पर शिकायत करनी चाहिए। समय पर सूचना मिलने से धन को रोकने और अपराधियों तक पहुंचने की संभावना बढ़ती है।
साइबर सुरक्षा की जागरूकता गांवों, स्कूलों, कॉलेजों, बाजारों और कार्यस्थलों तक पहुंचनी चाहिए। स्थानीय भाषाओं में अभियान अधिक प्रभावी हो सकते हैं। डिजिटल इंडिया की सफलता केवल सेवाओं के विस्तार में नहीं, बल्कि उनके सुरक्षित इस्तेमाल में है। साइबर सुरक्षा कोई कठिन तकनीकी विषय नहीं, बल्कि सतर्क रहने की दैनिक आदत है।















