नई दिल्ली, 22 सितंबर।
सिनेमा समाज का आईना है, लेकिन आईना केवल चेहरा नहीं दिखाता, वह समाज के भीतर चल रही हलचल को भी सामने लाता है। इसलिए फिल्मों के प्रमाणन से जुड़े नियमों में बदलाव को केवल सेंसर बोर्ड की सख्ती के रूप में देखना उचित नहीं होगा। असली सवाल यह है कि रचनात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच वह सीमा कहाँ खींची जाए, जहाँ दोनों का संतुलन बना रहे।
केंद्र सरकार ने 2024 में सिनेमैटोग्राफ (सर्टिफिकेशन) नियम लागू कर 1983 के नियमों को प्रतिस्थापित किया था। इनमें ऑनलाइन प्रक्रिया, प्रमाणन की समय-सीमा, दिव्यांग दर्शकों के लिए सुगम सुविधाओं तथा यूए श्रेणी में 7+, 13+ और 16+ आयु वर्ग जैसे बदलाव शामिल हैं। अब प्रमाणन संबंधी दिशानिर्देशों को लेकर हिंसा, नशीले पदार्थों, यौन हिंसा, महिलाओं और बच्चों के चित्रण जैसे विषयों पर फिर ध्यान केंद्रित होना इसी व्यापक व्यवस्था का हिस्सा है।
हिंसा को लेकर सावधानी समझ में आती है। अपराध करने की तकनीक को विस्तार से दिखाना या अपराधी जीवन को आकर्षक बनाना केवल मनोरंजन का विषय नहीं रह जाता। इसी तरह महिलाओं के अपमानजनक चित्रण, यौन हिंसा के अत्यधिक दृश्यात्मक प्रदर्शन, बच्चों के साथ क्रूरता और नशे के महिमामंडन पर नियंत्रण का उद्देश्य भी स्पष्ट है। लेकिन यहीं प्रमाणन व्यवस्था के सामने सबसे कठिन परीक्षा शुरू होती है - कहानी की जरूरत और अनावश्यक प्रदर्शन के बीच अंतर कौन और कैसे तय करेगा?
सिनेमा में युद्ध है तो हिंसा होगी, अपराध-कथा है तो अपराध होगा और सामाजिक यथार्थ पर फिल्म है तो असहज करने वाले दृश्य भी आएंगे। यदि हर असुविधाजनक दृश्य को हटाने का रास्ता अपनाया गया तो सिनेमा समाज का आईना कम और सुविधाजनक तस्वीर अधिक बन सकता है। दूसरी ओर, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हर दृश्य को उचित ठहराना भी सही नहीं होगा। स्वयं सीबीएफसी की प्रमाणन प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(2) में निर्धारित युक्तिसंगत प्रतिबंधों के ढांचे में काम करती है।
धर्म, समुदाय, राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी संबंधों से जुड़े प्रावधान विशेष रूप से संवेदनशील हैं। ऐसे मामलों में प्रमाणन अधिकारियों को शब्दों से अधिक संदर्भ समझना होगा। किसी दृश्य का उद्देश्य क्या है, वह कथा में क्यों है और उसका प्रभाव क्या हो सकता है - इन प्रश्नों का उत्तर केवल नियमों की सूची से नहीं मिल सकता।
एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि सीबीएफसी का मूल काम फिल्मों को प्रमाणित करना है। वर्तमान व्यवस्था में यू, यूए और आयु-आधारित यूए श्रेणियां दर्शकों को सामग्री के स्वरूप के बारे में जानकारी देने का माध्यम हैं। इसलिए प्रमाणन को केवल ‘कट लगाने वाली संस्था’ की छवि तक सीमित करना भी व्यवस्था की पूरी भूमिका को नहीं दर्शाता।
नई व्यवस्था की सफलता नियमों की कठोरता से नहीं, उनके पारदर्शी और समान अनुप्रयोग से तय होगी। फिल्मकारों को स्पष्ट मानदंड चाहिए और दर्शकों को जिम्मेदार सिनेमा। सबसे जरूरी यह है कि प्रमाणन प्रक्रिया रचनात्मकता को अनावश्यक रूप से कुंठित न करे और सामाजिक जिम्मेदारी को भी नजरअंदाज न करे। सिनेमा को न तो बेलगाम स्वतंत्रता चाहिए, न बेवजह की कैंची - उसे चाहिए विवेकपूर्ण प्रमाणन।















