मुंबई, 22 सितंबर।
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए विदेशी मुद्रा का मजबूत भंडार जितनी राहत देता है, कभी-कभी वही बड़ी मात्रा में आने वाला डॉलर बैंकिंग व्यवस्था के लिए नई चुनौती भी खड़ी कर देता है। इन दिनों भारतीय रिजर्व बैंक के सामने कुछ ऐसा ही संतुलन साधने का सवाल है। एक ओर वैश्विक परिस्थितियों, महंगे कच्चे तेल और अमेरिकी ब्याज दरों के दबाव में रुपया कमजोर हो रहा है, दूसरी ओर विदेशी मुद्रा की आवक से बैंकिंग प्रणाली में रुपये की तरलता बढ़ रही है। रिजर्व बैंक डॉलर-रुपया स्वैप और अन्य उपायों के जरिए इसी असंतुलन को संभालने की कोशिश कर रहा है। सितंबर में रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप के साथ डॉलर-रुपया स्वैप का इस्तेमाल अतिरिक्त रुपये की तरलता सोखने के लिए किया है।
सामान्य पाठक के लिए यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर डॉलर-रुपया स्वैप होता क्या है? सरल भाषा में समझें तो यह मुद्रा के तत्काल लेन-देन और भविष्य में उसे वापस करने की व्यवस्था है। रिजर्व बैंक जब डॉलर बेचकर रुपये लेता है और भविष्य में तय शर्तों पर डॉलर वापस करने का सौदा करता है, तो बाजार से रुपये की अतिरिक्त तरलता कुछ समय के लिए बाहर चली जाती है। इससे बैंकिंग प्रणाली में नकदी की मात्रा को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। यह केवल रुपये की कीमत बचाने का औजार नहीं, बल्कि मौद्रिक तरलता को संतुलित करने का माध्यम भी है।
आज की परिस्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की विदेशी मुद्रा स्थिति मजबूत होने के बावजूद रुपये पर दबाव बना हुआ है। 17 सितंबर को रुपया 96 रुपये प्रति डॉलर के स्तर के पार चला गया था, जिसके बाद रिजर्व बैंक के संभावित हस्तक्षेप की चर्चा हुई। वैश्विक तेल कीमतों में तेजी और अमेरिकी मौद्रिक नीति से जुड़ी अनिश्चितता रुपये के लिए दबाव पैदा कर रही है।
दूसरी तरफ, हाल के महीनों में विदेशी मुद्रा जुटाने की विशेष व्यवस्था से बैंकों के पास बड़ी मात्रा में डॉलर आए हैं। अगस्त के अंत तक इस योजना के तहत 65 अरब डॉलर से अधिक जुटाए जाने की सूचना थी। इतनी बड़ी डॉलर आवक को रुपये में बदलने पर घरेलू वित्तीय प्रणाली में तरलता बढ़ती है। यही कारण है कि रिजर्व बैंक को अब केवल रुपये की विनिमय दर नहीं, बल्कि बाजार में मौजूद रुपये की मात्रा पर भी नजर रखनी पड़ रही है।
यहीं से भारतीय अर्थव्यवस्था की असली चुनौती सामने आती है। रुपये को बहुत तेजी से गिरने से रोकना जरूरी है, लेकिन बाजार में जरूरत से ज्यादा नकदी भी महंगाई और वित्तीय असंतुलन को बढ़ा सकती है। रिजर्व बैंक पहले ही सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री के जरिए अतिरिक्त तरलता सोखने की दिशा में कदम उठा चुका है। सितंबर में 500 अरब रुपये की बॉन्ड बिक्री की गई और आगे भी तरलता प्रबंधन के उपाय किए जा रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम को केवल ‘रुपया बचाने की कवायद’ मानना अधूरा होगा। असल में रिजर्व बैंक एक साथ कई रस्सियों को थामे हुए है - रुपये की स्थिरता, महंगाई, बैंकिंग प्रणाली की तरलता, विदेशी पूंजी के प्रवाह और तेल की कीमतें। किसी एक मोर्चे पर उठाया गया कदम दूसरे मोर्चे पर असर डाल सकता है।
आम भारतीय के लिए इसका महत्व सीधा है। कमजोर रुपया आयातित कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनरी और अन्य आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ा सकता है। दूसरी ओर, निर्यातकों के लिए कमजोर रुपया कुछ परिस्थितियों में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ दे सकता है। इसलिए रुपये की मजबूती या कमजोरी को अपने आप में सफलता या असफलता का पैमाना मानना उचित नहीं होगा।
विदेशी मुद्रा भंडार की ताकत तभी अर्थपूर्ण है, जब उसका इस्तेमाल बाजार में अनावश्यक उथल-पुथल रोकने और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए विवेकपूर्ण ढंग से किया जाए। डॉलर की हर आवक खुशखबरी नहीं और रुपये की हर गिरावट संकट नहीं। असली कसौटी यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इन दोनों के बीच संतुलन कितनी समझदारी से कायम रखती है।
















