अहमदाबाद, 23 सितंबर।
नवरात्रि अभी शुरू भी नहीं हुई और गरबा केवल मैदानों में नहीं, सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बन गया है। इस बार चर्चा किसी नए गरबा कदम, पोशाक या संगीत को लेकर नहीं, बल्कि ‘रेंट ए गरबा पार्टनर’ के नाम से वायरल हो रही पोस्टों को लेकर है। इन पोस्टों में युवक-युवतियों को कुछ घंटों या पूरी रात के लिए गरबा साथी उपलब्ध कराने के दावे किए गए हैं। अलग-अलग पोस्टों में सिल्वर, गोल्ड और प्लेटिनम जैसे पैकेज बनाए गए हैं, जिनकी कीमत कुछ सौ रुपये से लेकर लगभग ६५०० रुपये तक बताई गई है। कुछ विज्ञापनों में गरबा, नृत्य के कदम सिखाने, एक जैसे कपड़े, तस्वीरें और रील बनाने जैसी सुविधाओं का उल्लेख है।
पहली नजर में यह सोशल मीडिया के उस संसार का हिस्सा लगता है, जहां हर चीज को मनोरंजन, सामग्री और बाजार में बदलने की कोशिश होती है। अकेले किसी कार्यक्रम में जाने वाले व्यक्ति के लिए साथी उपलब्ध कराने का विचार अपने आप में कोई अपराध नहीं है। दुनिया के कई हिस्सों में सामाजिक अवसरों के लिए साथ देने वाली सेवाओं के अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं। लेकिन समस्या उस समय शुरू होती है, जब ऐसी सेवा की वास्तविकता, व्यक्ति की पहचान, भुगतान की सुरक्षा और सेवा की शर्तें अस्पष्ट हों। ‘रेंट ए गरबा पार्टनर’ के मामले में फिलहाल सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि वायरल हो रहे विज्ञापनों के पीछे वास्तव में कौन है और उनका उद्देश्य क्या है।
अहमदाबाद साइबर अपराध शाखा ने इसी कारण लोगों को सावधान किया है। पुलिस इन पोस्टों और उनसे जुड़े खातों की निगरानी कर रही है। अधिकारियों के अनुसार कुछ पोस्ट वास्तविक सामाजिक माध्यम खातों से शुरू हुईं, बाद में इसी तरह की सामग्री कई दूसरे खातों पर दिखाई देने लगी और कुछ सामग्री के कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनाए जाने की आशंका भी सामने आई। पुलिस ने अनजान खातों को पैसे भेजने, संदिग्ध कड़ियों को खोलने और तस्वीर या अन्य संलग्न सामग्री के जरिए आने वाली सामग्री पर भरोसा करने से बचने की सलाह दी है। जांच इस संभावना को भी देख रही है कि ऐसे विज्ञापनों का इस्तेमाल फिशिंग, संदेश भेजने वाले अनुप्रयोगों को निशाना बनाने या वित्तीय धोखाधड़ी के लिए किया जा सकता है।
यही इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू है। सामाजिक माध्यमों ने भरोसे की परिभाषा बदल दी है। सामने किसी व्यक्ति की तस्वीर हो, हजारों अनुयायी हों और पोस्ट देखने में पेशेवर लगे, तो भी यह प्रमाण नहीं है कि उसके पीछे वही व्यक्ति मौजूद है या प्रस्ताव वास्तविक है। पहले ठगी के लिए फर्जी फोन कॉल और ई-मेल इस्तेमाल होते थे, अब मनोरंजन, दोस्ती, यात्रा और उत्सव तक को लालच का माध्यम बनाया जा सकता है। गरबा जैसे लोकप्रिय और भावनात्मक रूप से जुड़े उत्सव के नाम का इस्तेमाल लोगों का ध्यान जल्दी खींच सकता है।
दूसरा प्रश्न सामाजिक है। क्या हर उत्सव को सेवा और पैकेज में बदल देना बाजार की स्वाभाविक प्रक्रिया है? आज जन्मदिन से लेकर शादी, यात्रा और सामाजिक माध्यमों की सामग्री तक बहुत कुछ खरीदा-बेचा जा रहा है। इसलिए किसी व्यक्ति को गरबा में साथ देने की सेवा का विचार अपने आप में असाधारण नहीं कहा जा सकता। लेकिन जब साथ निभाने के नाम पर निजी बातचीत, हाथ पकड़ने, चुंबन या अन्य व्यक्तिगत व्यवहार जैसी चीजों को पैकेज का हिस्सा बताने वाली पोस्ट सामने आती हैं, तब सहमति, व्यक्तिगत सीमा और सुरक्षा के सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इन दावों की वास्तविकता की पुष्टि अलग विषय है; पर विज्ञापन में इस तरह की भाषा का इस्तेमाल यह जरूर दिखाता है कि लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए बाजार किस तरह निजी भावनाओं को भी उत्पाद की तरह प्रस्तुत कर सकता है।
यहां एक और सावधानी जरूरी है। वायरल पोस्टों को देखकर तुरंत इसे कोई ‘गैरकानूनी कारोबार’ या किसी विशेष प्रकार की आपराधिक गतिविधि घोषित कर देना भी उचित नहीं होगा। अभी पुलिस की जांच चल रही है और उपलब्ध जानकारी से सभी पोस्टों के पीछे एक ही संगठन या एक ही उद्देश्य होना साबित नहीं हुआ है। कुछ पोस्ट महज सामाजिक माध्यमों पर पहुंच और अनुयायी बढ़ाने के लिए बनाई गई हों, इसकी संभावना भी जांच के दायरे में है। इसलिए तथ्य और अनुमान के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
मुंबई में भी ऐसे विज्ञापनों को लेकर पुलिस जांच की मांग की गई है। एक विधायक ने पुलिस को पत्र लिखकर विज्ञापनों के पीछे काम कर रहे लोगों की पहचान और संभावित धोखाधड़ी तथा सुरक्षा संबंधी पहलुओं की जांच का आग्रह किया है। यह मांग अपने आप में किसी आरोप का प्रमाण नहीं है, लेकिन यह बताती है कि मामला अब केवल सामाजिक माध्यमों के मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा।
असल चुनौती शायद ‘गरबा पार्टनर’ से कहीं बड़ी है। डिजिटल दुनिया में वायरल होना अब विश्वसनीय होने का प्रमाण नहीं है। पसंद, टिप्पणी और साझा किए जाने की संख्या किसी सेवा की वैधता की गारंटी नहीं देती। उपभोक्ता को यह समझना होगा कि सामाजिक माध्यमों पर दिखाई देने वाली आकर्षक तस्वीर और वास्तविक व्यक्ति में अंतर हो सकता है। किसी अनजान खाते को अग्रिम भुगतान करना, निजी जानकारी देना या संदिग्ध कड़ी पर क्लिक करना केवल गरबा की शाम खराब नहीं कर सकता, बल्कि आर्थिक और डिजिटल सुरक्षा को भी खतरे में डाल सकता है।
नवरात्रि का उत्सव सामूहिक आनंद, संगीत और सहभागिता का पर्व है। बदलते समय के साथ उसके सामाजिक रूप भी बदलेंगे, यह स्वाभाविक है। लेकिन आधुनिकता का अर्थ विवेक को पीछे छोड़ देना नहीं हो सकता। साथी की तलाश हो या कोई ऑनलाइन सेवा - पहचान सत्यापित हो, शर्तें स्पष्ट हों, भुगतान सुरक्षित हो और व्यक्तिगत सीमाओं तथा सहमति का सम्मान हो। उत्सव का आधुनिक होना समस्या नहीं है; समस्या तब है जब उत्सव के उत्साह में सावधानी पीछे छूट जाए। ‘रेंट ए गरबा पार्टनर’ की वायरल कहानी इसलिए केवल गरबा की कहानी नहीं, बल्कि उस डिजिटल दौर का आईना है जिसमें मनोरंजन, बाजार और धोखाधड़ी के बीच की रेखाएं लगातार धुंधली होती जा रही हैं।
















