नई दिल्ली, 22 सितंबर।
भारत-अमेरिका संबंधों में पिछले कुछ महीनों की घटनाएं यह याद दिलाती हैं कि अंतरराष्ट्रीय रिश्ते स्थायी मित्रता से अधिक बदलते आर्थिक और सामरिक हितों पर टिके होते हैं। अमेरिका की नई टैरिफ नीति और रूस से भारत की तेल खरीद को लेकर बढ़ते दबाव ने दोनों देशों के रिश्तों के सामने एक कठिन परिस्थिति खड़ी कर दी है। सितंबर में अमेरिकी कांग्रेस से पारित कानून राष्ट्रपति को रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का अधिकार देता है। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी व्यापारिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगा।
इस विवाद की जड़ केवल टैरिफ नहीं है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और रूसी कच्चा तेल लंबे समय से उसकी ऊर्जा आपूर्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। भारत का तर्क है कि उसकी विशाल अर्थव्यवस्था और आबादी के लिए सुरक्षित, भरोसेमंद और प्रतिस्पर्धी कीमत पर ऊर्जा उपलब्ध होना आवश्यक है। दूसरी ओर, वाशिंगटन रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए उसके प्रमुख तेल खरीदारों पर दबाव डाल रहा है। यही टकराव व्यापार और विदेश नीति को एक-दूसरे से जोड़ रहा है।
विडंबना यह है कि इसी वर्ष फरवरी में भारत और अमेरिका ने व्यापार समझौते की दिशा में एक अंतरिम ढांचा घोषित किया था। इसमें भारत द्वारा अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क घटाने और अगले पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर के अमेरिकी ऊर्जा, विमान, प्रौद्योगिकी और अन्य उत्पाद खरीदने की योजना का उल्लेख था। अमेरिका ने भी भारतीय वस्तुओं पर कुछ टैरिफ कम करने का ढांचा प्रस्तुत किया था।
अब परिस्थितियां फिर बदल गई हैं। जुलाई में अमेरिकी प्रशासन ने भारतीय आयात पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत शुल्क लागू किया था। सितंबर में रूस से तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ नए संभावित शुल्क ने अनिश्चितता और बढ़ा दी है। इससे भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर भी असर पड़ सकता है।
भारत के सामने इसलिए केवल अमेरिका को जवाब देने का प्रश्न नहीं है। उसे ऊर्जा सुरक्षा, निर्यात बाजार, घरेलू कीमतों और व्यापक विदेश नीति के बीच संतुलन बनाना है। रूस से सस्ता तेल खरीदने का आर्थिक लाभ है, लेकिन उसके कारण अमेरिकी बाजार पर अतिरिक्त शुल्क का खतरा भी है। दूसरी ओर, अमेरिकी दबाव में तेल खरीद की दिशा अचानक बदलने से घरेलू ऊर्जा लागत प्रभावित हो सकती है।
ऐसे समय में नारे नहीं, बातचीत और विकल्पों की जरूरत है। भारत को अमेरिका के साथ संवाद बनाए रखते हुए यूरोप, रूस, पश्चिम एशिया और अन्य ऊर्जा एवं व्यापार साझेदारों के साथ अपने विकल्प भी मजबूत करने होंगे। किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता चाहे व्यापार की हो या ऊर्जा की, रणनीतिक जोखिम बन सकती है। वर्तमान संकट भारत के लिए यही संदेश लेकर आया है कि आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से दूरी नहीं, बल्कि विकल्पों की पर्याप्त गुंजाइश तैयार करना है।















