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संपादकीय
24 Sep, 2026

राष्ट्रीय सेवा योजना के 57 वर्ष: युवाओं में मानवता, जिम्मेदारी और सामाजिक चेतना की यात्रा

राष्ट्रीय सेवा योजना की 57 वर्षों की यात्रा ने युवाओं में सेवा, संवेदना, नागरिक जिम्मेदारी और समाज के प्रति भागीदारी की भावना को मजबूत करने में भूमिका निभाई है।

भोपाल, 24 सितंबर।

किसी समाज की वास्तविक ताकत उसकी इमारतों, तकनीक या आर्थिक संसाधनों से नहीं, बल्कि इस बात से पहचानी जाती है कि वहाँ के लोग एक-दूसरे के प्रति कितने संवेदनशील हैं। किसी जरूरतमंद की मदद के लिए आगे बढ़ना, किसी परेशान व्यक्ति की बात सुनना, किसी बच्चे के अधिकार के लिए आवाज उठाना या संकट के समय सहायता के लिए पहुँच जाना, ये छोटे दिखाई देने वाले व्यवहार ही समाज की बड़ी मानवीय पूँजी बनते हैं। राष्ट्रीय सेवा योजना की 57 वर्षों की यात्रा को इसी दृष्टि से देखें तो यह केवल एक योजना, शिविरों और गतिविधियों की कहानी नहीं है। यह युवाओं में उस संवेदना को विकसित करने की यात्रा है, जो उन्हें अपने भविष्य के बारे में सोचने वाले विद्यार्थी से समाज के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनने की ओर ले जाती है।

24 सितम्बर 1969 को महात्मा गांधी की जन्म शताब्दी के अवसर पर राष्ट्रीय सेवा योजना यानी एनएसएस की शुरुआत हुई। इसका मूल भाव “स्वयं से पहले आप” युवाओं को यह समझने का अवसर देता है कि व्यक्ति का विकास समाज से अलग नहीं हो सकता। समय के साथ समाज, तकनीक और युवाओं की दुनिया बदली है, लेकिन सेवा और सामाजिक जिम्मेदारी की जरूरत आज भी उतनी ही बनी हुई है।

आज अक्सर कहा जाता है कि नई पीढ़ी अधिक व्यक्तिगत और डिजिटल हो गई है। मोबाइल और सामाजिक माध्यमों ने दुनिया को करीब जरूर ला दिया है, लेकिन वास्तविक संवाद कई बार कम हुआ है। इसके बावजूद एनएसएस के अनुभव बताते हैं कि युवा संवेदनहीन नहीं है। उसे सही अवसर और दिशा मिलने की जरूरत है। जब कोई युवा गाँव या शहरी बस्ती में जाकर लोगों के साथ समय बिताता है, उनकी समस्याओं को समझता है और समाधान की प्रक्रिया में भाग लेता है, तो समाज को देखने का उसका नजरिया बदलता है। एनएसएस की बड़ी उपलब्धि केवल वह काम नहीं है जो स्वयंसेवक करता है, बल्कि वह बदलाव है जो उस अनुभव के बाद उसके भीतर बना रहता है।

क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, भोपाल में श्रमिकों के बच्चों की शिक्षा और व्यक्तित्व विकास के लिए एनएसएस की एक पहल इसका उदाहरण है। संस्थान के संकाय सदस्यों और कर्मचारियों ने स्वेच्छा से स्टेशनरी, पुस्तकें, नोटबुक, पेन-पेंसिल और अन्य शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराई, जिसे एनएसएस स्वयंसेवकों के माध्यम से बच्चों तक पहुँचाया गया। इसका महत्व केवल सामग्री उपलब्ध कराने में नहीं है। इसके पीछे यह सोच है कि जिन बच्चों के परिवार रोजी-रोटी के संघर्ष में लगे हैं, उनके लिए शिक्षा के बेहतर अवसर उपलब्ध कराना समाज की साझा जिम्मेदारी है। जब संस्थान अपने संसाधनों को बच्चों के भविष्य से जोड़ता है और स्वयंसेवक उस सहयोग को बच्चों तक पहुँचाते हैं, तो शिक्षा सामाजिक जिम्मेदारी का माध्यम बन जाती है।

एनएसएस के शिविरों में श्रमदान जैसी गतिविधियाँ भी इसी सोच को आगे बढ़ाती हैं। किसी गाँव की सफाई, तालाब या सार्वजनिक स्थान को बेहतर बनाने का काम केवल एक गतिविधि नहीं है। जब युवा अपने हाथों से किसी सार्वजनिक समस्या के समाधान में योगदान देता है, तो उसके भीतर यह समझ विकसित होती है कि समाज की जिम्मेदारी केवल सरकार या किसी संस्था की नहीं है। वह स्वयं भी इस समाज का भागीदार है। एनएसएस युवाओं को केवल यह नहीं बताता कि समाज के लिए क्या करना चाहिए, बल्कि उन्हें समाज के बीच ले जाकर अपनी भूमिका को अनुभव करने का अवसर देता है।

रक्तदान एनएसएस की सेवा भावना को व्यवहार में देखने का सरल माध्यम है। मध्यप्रदेश के खरगौन जिले के सनावद स्थित रेवा गुर्जर बाल निकेतन महाविद्यालय में 24 सितम्बर 2019 से शुरू हुई रक्तदान यात्रा इसका उदाहरण है। सात वर्षों में लगातार रक्तदान शिविर आयोजित हुए और हजारों यूनिट रक्तदान कराया गया। बाद के वर्षों में गोदग्रामों में भी शिविर लगाए गए, जहाँ ग्रामीण समुदाय ने भागीदारी की। रक्तदान केवल रक्त की उपलब्धता सुनिश्चित करने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह उस भावना को मजबूत करता है जिसमें एक व्यक्ति किसी अनजान व्यक्ति के जीवन की जरूरत को अपनी जिम्मेदारी समझता है।

कोविड-19 महामारी के दौरान एनएसएस स्वयंसेवकों ने मास्क और सैनिटाइजर वितरण, जरूरतमंदों तक भोजन पहुँचाने, प्रवासी श्रमिकों की सहायता, जागरूकता और प्रशासन के सहयोग जैसे कार्य किए। संकट के समय स्वयंसेवा का अर्थ केवल किसी अभियान में शामिल होना नहीं था। यह अपने आसपास के लोगों की जरूरत समझकर अपनी क्षमता के अनुसार आगे आने का समय था। इस अनुभव ने दिखाया कि स्वयंसेवा सामान्य परिस्थितियों की गतिविधि ही नहीं, बल्कि कठिन समय में समाज के साथ खड़े होने की तैयारी भी है।

मध्यप्रदेश में वर्ष 2019 से एनएसएस स्वयंसेवकों को बाल संरक्षण के विषय से जोड़ने की दिशा में भी काम हुआ। बाल श्रम, बाल विवाह और बाल दुर्व्यापार जैसी परिस्थितियों से बच्चों को बचाने में युवाओं की भागीदारी ने सेवा के अर्थ को एक नए सामाजिक प्रश्न से जोड़ा। किसी बच्चे को संकट में देखकर केवल सहानुभूति पर्याप्त नहीं है। उसके अधिकारों को समझना, सही संस्था तक जानकारी पहुँचाना और जरूरत पड़ने पर उसके पक्ष में खड़ा होना भी जिम्मेदार नागरिकता है। ‘आगाज इंटर्नशिप’ जैसे प्रयासों ने युवाओं को बाल संरक्षण से जुड़े स्थानीय सवालों पर विचार और समाधान विकसित करने का अवसर दिया।

मानवता का संस्कार केवल किसी शिविर में पैदा नहीं होता। उसका पहला विद्यालय परिवार होता है। बुजुर्गों का सम्मान, जरूरतमंद की मदद, हर व्यक्ति के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार और मतभेद के बावजूद संवाद बनाए रखना जैसे व्यवहार अगली पीढ़ी को मानवीय बनाते हैं। एनएसएस इसी सीख को समाज के बड़े स्तर पर अनुभव में बदलता है। स्वयंसेवक जब समाज के बीच जाता है तो वह केवल लोगों को कुछ सिखाने नहीं जाता, बल्कि उनकी परिस्थितियों और संघर्षों से स्वयं भी सीखता है। इसी दोतरफा सीखने में स्वयंसेवा का वास्तविक अर्थ छिपा है।

एनएसएस की मतदाता जागरूकता गतिविधियों ने युवाओं की नागरिक भूमिका को भी मजबूत किया है। “मेरा वोट–मेरा अधिकार” जैसे अभियानों के माध्यम से रैलियों, नुक्कड़ नाटकों, चित्रकला और चुनावी प्रक्रिया की जानकारी के जरिए लोगों को जागरूक किया गया। लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं है। अपने आसपास की समस्याओं को समझना, सार्वजनिक मुद्दों पर संवाद करना और समाज के प्रति जिम्मेदारी महसूस करना भी लोकतांत्रिक नागरिकता का हिस्सा है।

डिजिटल दुनिया में भी मानवीय जिम्मेदारी उतनी ही जरूरी है। सूचना साझा करने से पहले उसकी सत्यता जाँचना, किसी की निजता और सम्मान का ध्यान रखना तथा अफवाह को आगे न बढ़ाना आज की नागरिक जिम्मेदारी है। माय भारत जैसे मंच युवाओं को सेवा, प्रशिक्षण, इंटर्नशिप, नवाचार और मार्गदर्शन के अवसरों से जोड़ते हैं। तकनीक माध्यम बदल सकती है, लेकिन मानवीय मूल्य नहीं।

57 वर्षों में एनएसएस के कार्यक्रम और काम करने के तरीके बदले हैं, लेकिन “स्वयं से पहले आप” की भावना आज भी प्रासंगिक है। एनएसएस का प्रतीक चिन्ह कोणार्क के सूर्य मंदिर के रथ के पहिए से प्रेरित है, जो निरंतर गति और परिवर्तन का प्रतीक है। सेवा भी किसी एक दिन या एक शिविर की गतिविधि नहीं, बल्कि समाज के साथ निरंतर आगे बढ़ने की प्रक्रिया है।

आज जरूरत है कि एनएसएस केवल गतिविधियों की संख्या गिनने तक सीमित न रहे, बल्कि यह भी विचार करे कि उन गतिविधियों से समाज में क्या बदला और स्वयंसेवक के भीतर क्या परिवर्तन आया। यही यात्रा सेवा को अनुभव, अनुभव को संवेदना और संवेदना को सामाजिक जिम्मेदारी में बदलती है। एनएसएस की सबसे बड़ी विरासत ऐसे युवा हैं जो केवल अपने लिए सफल न हों, बल्कि समाज के लिए संवेदनशील, जिम्मेदार और उपयोगी भी हों।

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