उज्जैन, 15 सितंबर।
उज्जैन को लोग मंदिरों के दीयों से पहचानते हैं, पर उज्जैन की असली पहचान उसके दीयों के नीचे दबी मिट्टी में है। वह मिट्टी सिर्फ मिट्टी नहीं है, वह समय की तहों में लिपटी हुई एक पांडुलिपि है। अब जाकर पुरातत्व ने उस पांडुलिपि को फिर से पढ़ने का मन बनाया है, चार हजार वर्ष पुराने उस अध्याय को खोलने का निर्णय लिया है, जिसे हम ताम्रपाषाण काल कहते हैं। यह एक सभ्यता का अपने आप से संवाद है। उस दिन को याद करने का अवसर है, जब इंसान ने पहली बार घर बनाना सीखा होगा। उस दिन को, जब इस धरती पर पहली बार किसी ने शिप्रा के किनारे हल चलाया होगा, पहली बार किसी ने गीली मिट्टी को हाथों से गूंथकर घड़ा बनाया होगा, पहली बार किसी ने आग जलाकर अनाज भुना होगा। वही उज्जैन का पहला दिन था।
गढ़कालिका के टीले, वैश्य टेकरी, कुम्हार टेकरी, बड़नगर और महिदपुर के आसपास बिखरे छोटे-छोटे उभार जमीन के नहीं हैं। ये मानव के साहस के उभार हैं। ताम्रपाषाण का अर्थ ही है पत्थर से तांबे तक की यात्रा, जंगली से सभ्य होने की यात्रा और अकेले से गांव बनने की यात्रा। उज्जैन ने वह यात्रा सबसे पहले की।
मिट्टी के नीचे एक शहर और है। पुरातत्व विभाग अब ड्रोन से आकाश से इस धरती को देखेगा। थ्री-डी मानचित्र बनेंगे, क्यूआर कोड लगेंगे, सूचना पट्टिकाएं लगेंगी और फिर धीरे-धीरे कुदाल चलेगी। कुदाल चलेगी तो सिर्फ ईंट नहीं निकलेगी, एक पूरी जीवनशैली निकलेगी। कैसे लोग रहते थे, क्या खाते थे, कैसे बर्तन बनाते थे, कैसे पूजा करते थे - इन सबके उत्तर उस राख में छिपे हैं, जो अब तक टीले के नीचे सोई है।
उज्जैन को तीर्थ से आगे देखना होगा। हमने उज्जैन को केवल महाकाल तक सीमित कर दिया है। हम भूल गए कि महाकाल से भी पहले यहां मनुष्य था और वही मनुष्य इस नगरी की पहली प्रार्थना था। यदि चार हजार वर्ष पुराने प्रमाण मिलते हैं तो उज्जैन का इतिहास दो हजार से बढ़कर चार हजार वर्ष का हो जाएगा। वह भारत की उन चुनिंदा नगरियों में आ जाएगा, जो बिना रुके, बिना थके हजारों वर्षों से जीवित हैं।
यह सिर्फ खुदाई नहीं है। यह जड़ों की खोज है। एक पेड़ तभी ऊंचा होता है, जब उसकी जड़ें गहरी हों। उज्जैन को भी अपनी जड़ों को फिर से सींचना होगा।
विचार यह भी है कि इन पुरास्थलों को जोड़कर एक विरासत परिपथ बनाया जाए, ताकि जो यात्री महाकाल के दर्शन को आए, वह उस धरती को भी प्रणाम कर सके, जहां कभी उसके पुरखों ने पहला दिया जलाया था। पर्यटन का अर्थ केवल मंदिर नहीं होना चाहिए। पर्यटन का अर्थ होना चाहिए समय की यात्रा। और सबसे बड़ी बात, यह परिपथ हमारी आने वाली पीढ़ी को बताएगा कि इतिहास किताबों में नहीं, जमीन में बसता है।
शहर बसते हैं, उजड़ते हैं और फिर बसते हैं, पर कुछ शहर कभी नहीं उजड़ते। वे मिट्टी में अपनी स्मृति बचा लेते हैं। उज्जैन ऐसा ही शहर है। अब जरूरत है कि हम उसकी मिट्टी पर कान रखें और सुनें कि वह क्या कह रही है, क्योंकि जब कुम्हार टेकरी बोलेगी तो वह सिर्फ बर्तन की कहानी नहीं कहेगी, वह बताएगी कि मनुष्य होना क्या होता है।
















