नई दिल्ली, 15 सितंबर।
एक फ्रेम में तीन चेहरे हैं - भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग। तीन देशों की भौगोलिक दूरी हजारों किलोमीटर की है। तीनों की राजनीतिक व्यवस्थाएं अलग-अलग हैं। तीनों के हित कई बार टकराते भी हैं, पर एक मंच पर जब ये तीनों हाथ मिलाते हैं तो दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक सत्ता यानी डॉलर की नींव में हल्की-सी कंपन महसूस होती है।
नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की यही तस्वीर आज पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है। इसे केवल एक फोटो नहीं, बल्कि एक नई विश्व व्यवस्था का ट्रेलर कहा जा रहा है। ब्रिक्स अब सिर्फ पांच देशों का क्लब नहीं है। ब्रिक्स की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका से हुई थी। तब इसे पश्चिमी देशों ने एक आर्थिक सेमिनार जैसा ही माना था, पर अब स्थिति बदल चुकी है। ईरान, इथियोपिया, मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी इस परिवार में आ चुके हैं और सऊदी अरब जैसे बड़े तेल उत्पादक देश दरवाजे पर खड़े हैं। आज ब्रिक्स दुनिया की लगभग 45 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद में इसकी हिस्सेदारी जी-7 से ज्यादा हो चुकी है। सबसे बड़ी बात यह कि यह संगठन अब सिर्फ बात नहीं करता, बल्कि विकल्प बनाने लगा है।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अमेरिकी डॉलर दुनिया की आरक्षित मुद्रा बना हुआ है। तेल का व्यापार डॉलर में होता है, हथियारों का व्यापार डॉलर में होता है और संकट के समय अमेरिका डॉलर के जरिए ही प्रतिबंध लगाता है। रूस पर लगे प्रतिबंधों ने पूरी दुनिया को सिखा दिया कि यदि आपका सारा व्यापार डॉलर पर टिका है तो एक सुबह आपका बैंक खाता एक बटन से फ्रीज हो सकता है। इसी डर ने ब्रिक्स देशों को नई सोच पर मजबूर किया है। वह सोच है कि क्या हम अपने बीच का व्यापार अपनी मुद्राओं में कर सकते हैं? क्या हमें हर बार डॉलर के दरवाजे पर जाना जरूरी है? इसी प्रश्न से ब्रिक्स पे, न्यू डेवलपमेंट बैंक और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार जैसे विचारों ने जन्म लिया है।
इस सम्मेलन में सबसे ज्यादा ध्यान भारत, रूस और चीन के त्रिकोण पर है। यह त्रिकोण दुनिया की ताकत का सबसे पुराना और सबसे नया समीकरण है। रूस के पास ऊर्जा, तेल, गैस और सैन्य तकनीक है। चीन के पास मैन्युफैक्चरिंग है, दुनिया का सबसे बड़ा कारखाना वही है। भारत के पास बाजार, युवा आबादी और डिजिटल तकनीक का सबसे बड़ा प्रयोगशाला मॉडल है। यदि ये तीनों मिलकर एक वैकल्पिक व्यापार प्रणाली बनाते हैं तो यह केवल अमेरिका के लिए नहीं, बल्कि पूरे पश्चिमी वित्तीय ढांचे के लिए चुनौती होगी।
प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की कूटनीतिक, रणनीतिक और प्रबंधकीय कुशलता का जलवा दिखाया। सम्मेलन के उद्घाटन में उन्होंने स्पष्ट कहा कि ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ के देशों में परस्पर सहयोग और अंतरराष्ट्रीय मसलों में निर्णायक भूमिका पर जोर देकर संगठन के आगे के रोडमैप की राह दिखाई। साथ ही दिल्ली घोषणा पत्र को सर्वसम्मति से पारित करवाने में सफलता हासिल की। घोषणा पत्र में एक तरह से भारत के सभी एजेंडे होते दिखे। वहीं दूसरी ओर शी जिनपिंग से मुलाकात में मोदी की दो टूक बात भी चर्चा में रही - सीमा पर शांति जरूरी, मतभेद विवाद न बनें। यह संदेश साफ था कि सहयोग अपनी जगह है, पर संप्रभुता अपनी जगह। यही भारत की नई विदेश नीति की पहचान है।
डॉलर आज भी दुनिया की सबसे मजबूत और भरोसेमंद मुद्रा है। उसकी जगह लेना इतना आसान नहीं है। ब्रिक्स के पास अभी तक डॉलर जैसी कोई एक मुद्रा नहीं है और न ही निकट भविष्य में ऐसी कोई मुद्रा आने की संभावना है। चीन युआन को आगे बढ़ाना चाहता है, रूस रूबल में व्यापार चाहता है और भारत रुपये में। इसलिए ब्रिक्स का लक्ष्य डॉलर को खत्म करना नहीं, बल्कि डॉलर के विकल्प को जिंदा करना है, ताकि कोई एक देश मुद्रा का उपयोग हथियार के रूप में न कर सके।
यदि भारत ईरान से तेल रुपये में खरीदता है और रूस भारत को उर्वरक रूबल और रुपये के मिश्रण में बेचता है तो डॉलर की जरूरत अपने आप कम हो जाएगी। यह धीमी प्रक्रिया है, पर इसकी शुरुआत हो चुकी है। अमेरिका और यूरोप ने पिछले तीन दशकों तक दुनिया को एकध्रुवीय बनाए रखा। ब्रिक्स ने इसी व्यवस्था को चुनौती दी है। न्यू डेवलपमेंट बैंक इसका बड़ा उदाहरण है। यह बैंक विकासशील देशों को कर्ज देने का विकल्प उपलब्ध कराता है। यही छोटा-सा बदलाव बड़ी ताकत का संकेत है।
इस पूरी नई व्यवस्था में भारत की भूमिका सबसे दिलचस्प है। भारत अमेरिका का भी साझेदार है और रूस का भी पुराना मित्र है। भारत चीन का पड़ोसी भी है और प्रतिस्पर्धी भी। ऐसे में भारत ही वह देश है जो इस नई धुरी को टकराव से बचाकर सहयोग की दिशा में ले जा सकता है। ब्रिक्स का भविष्य केवल चीन या रूस नहीं, बल्कि भारत भी तय करेगा।
दुनिया की ताकत के तीन कोण एक साथ खड़े होकर एक ही बात कह रहे हैं कि दुनिया अब एक दुकान से नहीं चलेगी। दुनिया को अब कई काउंटर चाहिए। डॉलर आज भी राजा है, पर अब उसके दरबार में सवाल पूछने वाले भी आ गए हैं। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने डॉलर को नहीं हराया है, पर उसने यह बता दिया है कि अब विकल्प मौजूद है। और जब बाजार में विकल्प आता है तो एकाधिकार अपने आप कमजोर होने लगता है। यही नई ताकत के उदय की सबसे बड़ी पहचान है।
















