भोपाल, 15 सितंबर।
ठग तेज है, सिस्टम सुस्त है। हर दिन बारह सौ फोन। हर फोन के पीछे किसी की पूरी जिंदगी की कमाई लुटने की कहानी है। कोई रिटायर्ड मास्टर है, जिसका पेंशन वाला खाता खाली हो गया। कोई छात्र है, जिसके लोन के नाम पर दस्तावेज चुरा लिए गए। कोई महिला है, जिसे डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर घंटों कैमरे पर बैठाए रखा गया। यह आंकड़ा अब खबर नहीं रहा, यह रोज की हकीकत बन गया है। साइबर अपराध अब चोरी नहीं, बल्कि संगठित उद्योग बन चुका है और इस उद्योग के सामने हमारा सुरक्षा तंत्र आज भी लाठी और रजिस्टर वाले दौर में खड़ा नजर आ रहा है।
सरकार ने पोर्टल बनाए हैं, हेल्पलाइन बनाई है, जागरूकता के विज्ञापन भी चल रहे हैं। पर विज्ञापन से ठग नहीं पकड़ा जाता। ठग को पकड़ने के लिए स्टाफ, टेक्नोलॉजी और सबसे ज्यादा प्राथमिकता चाहिए। वहीं पर पूरी व्यवस्था सबसे कमजोर दिख रही है। राज्य में साइबर मुख्यालय की तस्वीर हैरान करने वाली है। कुल स्वीकृत पद दो सौ तिरानवे और भरे हुए केवल दो सौ पचपन। इसमें भी साइबर थानों के लिए स्पेशल विंग की हालत खराब है।
हर महीने करीब छत्तीस हजार शिकायतें और उन्हें सुनने के लिए महज चौसठ फीसदी कॉल उठा पाने वाला सिस्टम। मतलब हर तीन में से एक पीड़ित सिर्फ इसलिए ठगा रह जाता है, क्योंकि उसकी कॉल ही नहीं लग पाती। जब पीड़ित की कॉल नहीं लगेगी तो शिकायत दर्ज नहीं होगी। शिकायत दर्ज नहीं होगी तो एफआईआर नहीं होगी और जब एफआईआर नहीं होगी तो ठग को लगेगा कि यह सबसे सुरक्षित अपराध है। इसी सोच ने ठगों का हौसला बढ़ाया है।
प्रदेश में साइबर अपराध की रफ्तार को देखते हुए कम से कम तैंतीस सौ पदों की जरूरत है। हर जिले में एक फुल फ्लेज्ड साइबर थाना, डिजिटल फोरेंसिक लैब, ट्रेसिंग के लिए हाईटेक सॉफ्टवेयर और प्रशिक्षित हाथ चाहिए। पर स्टेट साइबर पुलिस मुख्यालय और उसकी क्षेत्रीय इकाइयों में स्टाफ की तंगी बड़ी दीवार बन गई है। हाईटेक अपराध का ग्राफ रोज ऊपर जा रहा है, पर भर्ती का ग्राफ वहीं का वहीं है। नई तकनीक पुराने हाथों में फंस गई है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब हजारों करोड़ की ठगी हो रही है तो इसे सबसे बड़ी प्राथमिकता क्यों नहीं माना जा रहा? जब आम आदमी की छोटी-छोटी रकम लुटती है तो उसे साइबर जागरूकता का भाषण दे दिया जाता है। भाषण से जागरूकता आ सकती है, पर सुरक्षा नहीं आती। सुरक्षा तब आएगी जब समय पर कॉल उठे, लिंक ब्लॉक हो और खाता फ्रीज हो।
आज के दौर में अपराधी बैंक नहीं लूटता, वह आपका फोन लूटता है और फोन लुटने का मतलब है आपकी पहचान लुटना। ऐसे में साइबर थाने को थाने जैसा नहीं, बल्कि अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड जैसा होना चाहिए, जहां चौबीस घंटे रोशनी जले और हर कॉल पर तुरंत रिस्पॉन्स हो।
तैंतीस सौ पदों का प्रस्ताव तुरंत मंजूर होना चाहिए और भर्ती तुरंत होनी चाहिए। कॉन्ट्रैक्ट पर नहीं, बल्कि स्थायी और प्रशिक्षित भर्ती। हर जिले में साइबर थाने को मजबूत करना होगा। साइबर अपराध अब बड़े शहरों का विषय नहीं रहा, वह छोटे कस्बों और गांवों तक पहुंच गया है। पुलिस के साथ-साथ बैंकों और टेलीकॉम कंपनियों की जवाबदेही भी तय करना जरूरी है। ठगी का पैसा किसी खाते में जाता है। वह खाता कैसे खुला, उसका केवाईसी किसने किया, यह जांच का हिस्सा होना चाहिए। साइबर ठगी अब केवल कानून व्यवस्था का विषय नहीं रहा। यह आर्थिक सुरक्षा और आम आदमी के भरोसे का विषय है। जब भरोसा टूटता है तो ठग नहीं, सिस्टम जीतता है।















