मध्यप्रदेश, 17 सितंबर।
सरकार की स्वास्थ्य प्रणाली जीवन रक्षक प्रणाली होती है। अगर यही बीमार हो जाए तो फिर सरकार भी स्वस्थ नहीं मानी जाती। मृत्यु अटल है, लेकिन अगर यह स्वास्थ्य प्रणाली की नाकामी और लापरवाही के कारण आए तो फिर यह हत्या बन जाती है।
मध्यप्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली दुर्दिनों के चरम पर पहुंचती जा रही है। इस लापरवाही से लोग जब मरने लगे, इसकी अव्यवस्था और अराजकता जब लाशों को भी सुरक्षित नहीं रख पाई, जब नकली दवाओं का इतना बोलबाला हो कि खांसी का सिरप ही मौत का सल्फास बन जाए, जब विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा के बड़ी संख्या में बच्चे मलेरिया और मीजल्स की बीमारी के कारण मर जाएं, तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह ऐसी बीमारी है जिसका सुनिश्चित इलाज है। मीजल्स की तो जन्म के साथ ही टीकाकरण की व्यवस्था है। इसका मतलब है कि आदिवासी इलाकों में टीकाकरण भी नहीं मिल पा रहा है।
एमपी की स्वास्थ्य प्रणाली के कर्णधार अपने गृह जिले में भी सुधार नहीं ला पा रहे हैं। विपक्षी उनके खिलाफ प्रदर्शन और आंदोलन कर रहे हैं। ऐसे प्रदर्शन असफलता आंकने के लिए पैमाना नहीं हैं, लेकिन जिन मुद्दों पर प्रदर्शन हो रहे हैं, वे जरूर अक्षमता और असफलता स्थापित करते हैं। शुक्ल पक्ष चांदनी का प्रतीक है। प्रकाश का पक्ष है, वहीं कृष्ण पक्ष को अंधकार का पक्ष माना जाता है। अगर इस भाषा में देखा जाए तो एमपी की स्वास्थ्य प्रणाली अब तक कृष्ण पक्ष से बाहर नहीं आ पाई है। भले ही बात शुक्ल पक्ष की होती रहे, लेकिन वास्तविकता अंधकारपूर्ण ही दिखती है।
सबसे बड़ी चिंता की बात जवाबदेही का अभाव है। जब जहरीले सिरप के कारण बच्चे मरे थे, तब भी जांच और कार्रवाई की बातें हुई थीं, लेकिन सब लीपापोती में चला गया। अब जब बालाघाट में विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा के बच्चे इलाज के अभाव में मौत के मुंह में समाए हैं, तब जांच और व्यवस्थाओं के सुधार की बातें हो रही हैं। वहां डॉक्टरों की पदस्थापना भी हो रही है। पक्ष-विपक्ष सभी दलों के लोग शायद मौतों के बाद ही जागते हैं। जिन जिलों में अब तक मौतें नहीं हुई हैं, क्या वहां स्वास्थ्य प्रणाली और सुविधाएं संतोषजनक हैं? डॉक्टरों का अभाव आदिवासी क्षेत्र तो क्या, राजधानी और बड़े शहरों में भी बना हुआ है।
डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस में लगे हुए हैं। सिस्टम के कर्णधार डॉक्टरों को प्राइवेट प्रैक्टिस छोड़ने की कितनी भी चेतावनी दें, सब बेअसर होती हैं। जब प्राइवेट स्वास्थ्य सुविधा बहुत सीमित थी, तब भी मध्यप्रदेश में प्राइवेट प्रैक्टिस प्रतिबंधित करने का कदम उठाया गया था। कई विशेषज्ञों ने सरकारी सेवाएं छोड़ दी थीं। फिर सरकारें प्राइवेट प्रैक्टिस पर आंखें मूंद लेती हैं।
स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार तो बहुत हुआ है। सरकारी क्षेत्र में भी विस्तार हुआ है और प्राइवेट में तो यह विस्तार बहुत तेज हुआ है। लगभग हर जिले में मेडिकल कॉलेज स्थापित हो गए हैं। मेडिकल की सीटें बढ़ गई हैं। फिर भी जूनियर डॉक्टरों को स्टाइपेंड के लिए आंदोलन करना पड़ता है। बिना आंदोलन के स्टाइपेंड में वृद्धि नहीं होना यही बताता है कि सरकारी सिस्टम पूरी तरह से गंभीर बीमारी से ग्रसित है। जब सड़कों पर जाम किया जाता है, तब ही उनकी नींद खुलती है। अब लोगों ने भी इस रास्ते पर चलने का शायद संकल्प कर लिया है।
नकली दवाओं का तो जैसे जाल बिछा हुआ है। सरकारी अस्पतालों में दवाओं की खरीदी का सिस्टम भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है। गंभीर बीमारियों की जीवन रक्षक दवाइयां भी नकली व्यापार की जद में हैं। सरकारी और निजी स्वास्थ्य प्रणाली की सांठगांठ पूरी व्यवस्था को लूट की व्यवस्था बनाने में लगी हुई है। आयुष्मान योजना आने के बाद सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में बहुत ज्यादा भेद बचा नहीं है। गरीबों को आयुष्मान कार्ड पर प्राइवेट अस्पताल में भी मुफ्त इलाज की सुविधा उपलब्ध होती है। इसके दुरुपयोग की भी खबरें आती हैं। अस्पतालों को प्रतिबंधित किया जाता है, लेकिन फिर भी यह सब चलता रहता है। आयुष्मान के इलाज का पूरा नियंत्रण सरकारी सिस्टम के पास है, लेकिन फिर भी इसमें इतने घोटाले बिना सरकारी भागीदारी के संभव नहीं हो सकते हैं।
पेपर लीक और प्रवेश घोटाले तो चल ही रहे हैं, अब तो सरकारी व्यवस्था में कोई ऐसा तंत्र दिखाई नहीं पड़ता, जहां भ्रष्टाचार न हो। बिना रिश्वत के कोई भी काम करना लगभग असंभव हो गया है। निजी क्षेत्र के डॉक्टर जितनी कमाई करते हैं, वह सरकारी डॉक्टरों में ईर्ष्या पैदा करती है। सरकारी पद में जॉब गारंटी होती है, शायद इसलिए ही डॉक्टर सरकारी अस्पतालों में ज्वाइन करते हैं।
डॉक्टरों के ट्रांसफर स्वास्थ्य प्रणाली के कर्णधारों की कमाई का बड़ा जरिया होते हैं। तबादलों के सीजन में केवल लिस्ट में नाम होने के प्रचार पर ही लाखों रुपये इकट्ठे कर लिए जाते हैं।
महंगा इलाज अपने आप में लोगों की जीवन रक्षा में बड़ी बाधा है। सुविधाओं का विस्तार तो हुआ है, लेकिन उसकी गुणवत्ता पर अभी भी कई सवाल हैं। सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली की विश्वसनीयता नीति-निर्माताओं में नहीं बची है। बैगा आदिवासी बच्चों की मौत का मामला हाई कोर्ट पहुंच गया है।
सरकारें बदलने और मंत्री बदलने से भी व्यवस्था नहीं बदलती। यह तो अब प्रमाणित हो चुका है। व्यवस्था बदलने के लिए क्या करना पड़ेगा, यह शायद किसी को पता नहीं है। या ऐसी व्यवस्था सबके लिए लाभ की भागीदारी सुनिश्चित करती है।
जब कृष्ण पक्ष का अंधेरा होता है तो थोड़ा प्रकाश भी उजाला जैसा दिखता है। सिस्टम की खामियां और अक्षमताएं कई बार कर्णधारों पर भारी पड़ जाती हैं। इसी मध्यप्रदेश में एक पावरफुल स्वास्थ्य मंत्री के पावरफुल प्राइवेट सेक्रेटरी ने सरकारी अस्पताल में ही अचानक दम तोड़ दिया था।
















