मध्य प्रदेश, 17 सितंबर।
स्कूल की घंटी बजती है। बच्चे बस्ता कंधे पर टांगकर बाहर निकलते हैं और बाहर उनका इंतजार भूख नहीं करती। बाहर उनका इंतजार रंग-बिरंगे पैकेट करते हैं, जो चमकते हैं, ललचाते हैं और धीरे-धीरे शरीर में उतर जाते हैं। मध्य प्रदेश में अब इसी चमक पर सवाल उठा है। बाल संरक्षण आयोग ने कहा है कि स्कूल और कॉलेज के 50 मीटर के दायरे में जंक फूड की बिक्री नहीं होनी चाहिए। विज्ञापन नहीं होना चाहिए और बच्चों को फंसाने वाली ब्रांडिंग भी नहीं होनी चाहिए। यह आदेश जैसा लगता है, पर सच में यह एक चिंता है, एक पीड़ा है, जो कागज पर नहीं, बल्कि बच्चों की सांसों में लिखी हुई है।
पचास मीटर की दूरी नहीं, दृष्टि है। पचास मीटर क्या होता है? दो-चार दुकानें, एक ठेला और एक छोटा-सा मोड़। पर इसी छोटे से दायरे में बचपन का सबसे बड़ा सौदा होता है। बच्चा ज्ञान लेकर निकलता है और बीमारी लेकर घर जाता है।
हाई फैट, साल्ट, शुगर वाला भोजन यानी एचएफएसएस। नाम जितना तकनीकी है, असर उतना ही गहरा है। यह भोजन नहीं है, यह स्वाद के नाम पर परोसा जा रहा धीमा जहर है। यह रोक सिर्फ बिक्री तक सीमित न रहे, प्रचार भी रुके, पोस्टर भी हटें और वह भाषा भी बदले, जो बच्चों को ललचाती है। क्योंकि बच्चा तर्क से नहीं, चित्र से सीखता है और चित्र अगर गलत होगा तो भविष्य भी गलत होगा।
मध्य प्रदेश एक अजीब मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ कुपोषण है, जहां बच्चों को भरपेट भोजन नहीं मिलता। दूसरी तरफ अतिपोषण का भ्रम है, जहां बच्चों को भोजन तो मिलता है, पर वह भोजन नहीं है। एक तरफ थाली खाली है, दूसरी तरफ थाली भरी है, पर जंक फूड से भरी है।
विद्यालय स्तर पर खान-पान की आदतें सुधर जाएं तो भविष्य में मोटापा, मधुमेह और रक्तचाप जैसी बीमारियां कम हो सकती हैं। बात सही है, क्योंकि बचपन में जो जीभ सीखती है, वही उम्र भर शरीर चलाता है। यदि जीभ ने नमक और चीनी का अतिरेक सीख लिया तो शरीर कभी संतुलन नहीं सीख पाएगा।
कभी ध्यान दिया है कि जंक फूड के पैकेट पर हमेशा हंसता हुआ कार्टून क्यों होता है? क्यों मुफ्त खिलौने का लालच दिया जाता है? क्यों चटख रंगों का उपयोग होता है? क्योंकि बाजार जानता है कि बच्चा तर्क से नहीं, भाव से खरीदता है और भाव को पकड़ना सबसे आसान है। स्कूल के बाहर लगा एक बड़ा होर्डिंग, जिस पर पिज्जा से पनीर खिंच रहा हो या कोल्ड ड्रिंक से बर्फ टपक रही हो, वह भोजन नहीं बेचता, वह इच्छा बेचता है। और इच्छा जब बार-बार देखी जाती है तो वह आदत बन जाती है। इसीलिए आयोग ने विज्ञापन पर रोक की बात कही है। यह रोक व्यापार के खिलाफ नहीं है, यह बचपन के पक्ष में है।
छोटे विक्रेता की चिंता भी जरूरी है। जो स्कूल के बाहर खड़ा होकर अपना घर चलाता है, उसकी रोजी-रोटी भी इसी पर टिकी है। आयोग ने इस बात को समझा है। इसीलिए कहा है कि प्रस्ताव का उद्देश्य आजीविका छीनना नहीं है। उद्देश्य है व्यवहार बदलना। यदि वही विक्रेता समोसा-कचोरी की जगह भुने चने, फल, छाछ और सत्तू बेचे तो क्या बुरा है? रोजगार भी रहेगा और स्वास्थ्य भी बचेगा। बदलाव हटाने से नहीं, जोड़ने से आता है।
हमारी आदत बन गई है कि पहले बीमार होने दो, फिर अस्पताल ले जाओ। पहले मोटापा आने दो, फिर डाइट प्लान बनाओ। आयोग ने इसी सोच को पलटने की बात कही है - इलाज से पहले बचाव। शिक्षा मंत्री को लिखे पत्र में आयोग ने स्पष्ट कहा है कि 50 मीटर के दायरे को लेकर दिशा-निर्देश जारी हों। साथ ही स्थानीय निकाय, जिला प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग मिलकर निगरानी करें। कैफेटेरिया, छात्रावास और कैंटीन के लिए भी नियम बनें। यह सिर्फ एक विभाग का काम नहीं है। यह पूरे समाज का काम है, क्योंकि बच्चा सिर्फ स्कूल का नहीं है। बच्चा पूरे प्रदेश का भविष्य है।
भोजन केवल स्वाद नहीं, संस्कार है। हमारे यहां कहा जाता है - जैसा अन्न, वैसा मन। आज अन्न ही बदल गया है। अन्न अब खेत से नहीं, फैक्ट्री से आता है। उसमें मिट्टी की खुशबू नहीं है, उसमें केमिकल की चमक है। उसमें मां के हाथ का स्पर्श नहीं है, उसमें मशीन की तेजी है। जब बच्चा रोज ऐसा अन्न खाएगा तो उसका मन कैसा बनेगा? क्या वह धैर्य सीखेगा? क्या वह संतोष सीखेगा? नहीं, वह केवल त्वरित तृप्ति सीखेगा और त्वरित तृप्ति ही आज की सबसे बड़ी बीमारी है।
पचास मीटर की यह लक्ष्मण रेखा नहीं, प्रेम रेखा है। इसे रोक मत समझिए, इसे प्रेम समझिए। यह स्कूल और समाज के बीच खींची जा रही है, ताकि बच्चा सुरक्षित रहे। यदि स्कूल के भीतर योग सिखाया जा रहा है तो बाहर योग के विरुद्ध आहार क्यों हो? यदि कक्षा में संतुलित आहार पढ़ाया जा रहा है तो गेट पर असंतुलित आहार क्यों बिके? यह विरोधाभास खत्म होना चाहिए।
भविष्य में जब यह योजना लागू होगी तो स्कूल का गेट सिर्फ प्रवेश द्वार नहीं रहेगा, वह स्वास्थ्य का द्वार भी बनेगा। बच्चा जब बाहर निकलेगा तो उसे रंग-बिरंगे जंक फूड नहीं, बल्कि जीवन देने वाले विकल्प दिखेंगे। क्या हमने कभी सोचा है कि हम अपने बच्चों के हाथ में टिफिन के साथ क्या दे रहे हैं - पैसा या समझ, स्वाद या संस्कार, लालच या प्रेम? पचास मीटर का यह निर्णय हमें उसी प्रश्न के सामने खड़ा करता है और उत्तर हमें ही देना है, क्योंकि बच्चे तो वही खाएंगे जो हम दिखाएंगे, वही सीखेंगे जो हम सिखाएंगे। बचपन को बचाना है तो पहले उसके आसपास की हवा बदलनी होगी और हवा बदलने की शुरुआत स्कूल के दरवाजे से ही होती है।
















