मध्यप्रदेश, 17 सितंबर।
मध्यप्रदेश में नर्सिंग कॉलेजों का जो सच सामने आया है, वह केवल घोटाला नहीं है, वह पूरी शिक्षा व्यवस्था पर एक तमाचा है। सीबीआई ने जब नाम, पिता का नाम और जन्मतिथि मिलाई तो पता चला कि प्रदेश में 1,266 शिक्षक ऐसे हैं, जो एक ही समय में कई-कई कॉलेजों में पढ़ा रहे हैं। 3,251 बार एक ही नाम को अलग-अलग कॉलेजों में दर्ज किया गया। 1,608 शिक्षकों का तो नर्सिंग काउंसिल में कोई रिकॉर्ड ही नहीं है। मतलब न शिक्षक है, न रिकॉर्ड है, पर कॉलेज चल रहा है और मान्यता भी है। यह जादुई हाजिरी का खेल है। कागज पर शिक्षक आता है, कागज पर पढ़ाता है और कागज पर ही छात्रों को नर्स बना देता है।
ग्वालियर-चंबल संभाग के आठ जिलों में 194 कॉलेज ऐसे मिले, जो पूरी तरह डुप्लीकेट फैकल्टी के सहारे चल रहे थे। 766 नाम ऐसे थे, जो सिर्फ कागजों में थे। एक-एक जिले का आंकड़ा देखिए तो समझ आएगा कि यह कितना बड़ा नेटवर्क था। ग्वालियर में 114 कॉलेजों में 468 फर्जी नाम, दतिया में 25 कॉलेजों में 72, मुरैना में 25 में 67, भोपाल जैसे राजधानी शहर में 85 कॉलेजों में 578 फर्जी एंट्रियां, इंदौर में 41 कॉलेजों में 202 और जबलपुर में 22 कॉलेजों में 84 फर्जी एंट्रियां मिलीं। और सबसे हैरान करने वाली बात यह कि एक शिक्षक 24 कॉलेजों में पढ़ाता दिखाया गया। उसका नाम तीन साल में 24 जगह दर्ज था। 20 कॉलेजों में 11, 21 कॉलेजों में 10 और 22 कॉलेजों में तीन बार नाम दर्ज हुआ। क्या कोई व्यक्ति एक ही समय में 24 जगह पढ़ा सकता है? पर कागज पर तो वह पढ़ा रहा था।
आर्टिकल की नजर से देखें तो सवाल सिस्टम पर है। यह केवल कुछ कॉलेज संचालकों के लालच की कहानी नहीं है, यह सिस्टम की मिलीभगत की कहानी है। नर्सिंग जैसे संवेदनशील कोर्स की मान्यता देने से पहले जांच होनी चाहिए थी। फैकल्टी का वेरिफिकेशन होना चाहिए था। बायोमेट्रिक हाजिरी होनी चाहिए थी, पर कुछ नहीं हुआ। सत्र 2020-21 में 561 कॉलेजों में 1,060 शिक्षक डुप्लीकेट मिले। उनकी एंट्री 2,527 बार हुई। अगले साल 285 कॉलेजों में 275 शिक्षक फिर डुप्लीकेट मिले। मतलब एक बार पकड़े जाने के बाद भी वही खेल चलता रहा।
मान्यता देने वाली एजेंसियों ने आंखें बंद कर रखी थीं। काउंसिल में रिकॉर्ड ही नहीं और कॉलेज में वह प्रोफेसर है, तो फिर मान्यता कैसे मिली? यह सवाल आज हर अभिभावक पूछ रहा है।
नर्सिंग कोई सामान्य डिग्री नहीं है। यह जान बचाने की जिम्मेदारी है। एक गलत इंजेक्शन, एक गलत दवा, एक गलत प्राथमिक उपचार से मरीज की जान जा सकती है। अगर नर्स ने कभी प्रैक्टिकल ही नहीं किया, अगर उसे पढ़ाने वाला ही कागजी था तो वह अस्पताल में क्या करेगी? आज प्रदेश के कई निजी अस्पतालों में ऐसे नर्स काम कर रहे हैं, जिनकी डिग्री तो है, पर ज्ञान नहीं है। यह मरीज की सुरक्षा के साथ सीधा खिलवाड़ है।
हम डॉक्टरों की कमी की बात करते हैं, पर नर्सिंग स्टाफ की गुणवत्ता की बात नहीं करते। जब तक नर्सिंग शिक्षा कागजों पर चलती रहेगी, तब तक स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती।
इस पूरे फर्जीवाड़े ने एक बात साफ कर दी है कि नर्सिंग शिक्षा में सुधार की जरूरत है। सबसे पहले सभी 633 कॉलेजों की दोबारा जांच होनी चाहिए। हर फैकल्टी की फिजिकल उपस्थिति और बायोमेट्रिक रिकॉर्ड चेक होना चाहिए। जो कॉलेज डुप्लीकेट फैकल्टी पर चल रहे हैं, उनकी मान्यता हमेशा के लिए रद्द होनी चाहिए।
नर्सिंग कॉलेजों को अस्पताल से जोड़ा जाए। जहां अस्पताल नहीं, वहां कॉलेज नहीं, ताकि छात्र सिर्फ किताब नहीं, बल्कि मरीज के बीच सीखें। जरूरी है कि दोषी अधिकारियों पर भी कार्रवाई हो। केवल कॉलेज संचालक ही दोषी नहीं हैं। जिन अधिकारियों ने बिना जांच मान्यता दी, वे भी बराबर के जिम्मेदार हैं।
नर्सिंग का मतलब सेवा है, पर जब सेवा की पढ़ाई ही फर्जी हो तो सेवा कैसे ईमानदार होगी? यह समय है कि कागजी हाजिरी बंद हो और असली पढ़ाई शुरू हो।
















