मध्यप्रदेश, 17 सितंबर।
मध्यप्रदेश में आज कर्ज लेना जितना आसान हो गया है, उतना ही कठिन हो गया है कर्ज के बाद चैन से सोना। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में वसूली एजेंटों की गुंडागर्दी अब अपवाद नहीं रही, बल्कि एक पैटर्न बन गई है। तीन साल में 342 शिकायतें और उसके बाद सिर्फ नौ महीने में 351 नई शिकायतें। यह उछाल इस बात का सबूत नहीं है कि अचानक एजेंट बिगड़ गए हैं, बल्कि इस बात का सबूत है कि अब लोग डर की चादर हटाकर बोलने लगे हैं। पहले लोग फोन पर गाली सुनकर चुप हो जाते थे, अब वे लिखकर शिकायत कर रहे हैं और यही बदलाव सबसे बड़ा है।
संसद में रखे गए आंकड़े एक अजीब विरोधाभास दिखाते हैं। वर्ष 2025-26 में देशभर में वसूली एजेंसियों के खिलाफ 18,021 शिकायतें आईं। इनमें मध्यप्रदेश का हिस्सा सिर्फ 195 यानी करीब एक प्रतिशत है, जबकि देश की आबादी में मध्यप्रदेश का हिस्सा लगभग छह प्रतिशत है। सवाल यह है कि क्या मध्यप्रदेश में एजेंट ज्यादा सभ्य हैं? क्या मध्यप्रदेश का कर्जदार ज्यादा डरा हुआ है? सच्चाई दूसरी है। गांव और कस्बे का आदमी यह मानता है कि बैंक से लड़ना सरकार से लड़ना है। उसे लगता है कि अगर उसने शिकायत की तो उसका सिबिल खराब हो जाएगा, उसे लोन कभी नहीं मिलेगा, उसकी बेइज्जती होगी। इसी अज्ञानता का फायदा एजेंट उठाते हैं। इसीलिए आबादी ज्यादा और शिकायत कम है। यह कम शिकायत गर्व की बात नहीं, शर्म की बात है।
तीन साल का गणित देखिए। 2023-24 में 49 शिकायतें, 2024-25 में 98 शिकायतें और 2025-26 में 195 शिकायतें। हर साल संख्या लगभग दोगुनी। यह ग्राफ केवल शिकायत का नहीं है, यह जागरूकता का ग्राफ है। जब आरबीआई ने कहा कि वसूली एजेंट रात-बेरात फोन नहीं कर सकते, परिवार को धमका नहीं सकते और गाली-गलौज नहीं कर सकते, तब जाकर लोगों को लगा कि कानून उनके साथ भी है। पर कानून के बाद भी हकीकत नहीं बदली। आरबीआई ने 28 नवंबर 2025 को सख्त दिशा-निर्देश जारी किए। कहा कि किसी भी सूरत में गैरकानूनी तरीका न अपनाया जाए और कर्जदार को उचित नोटिस दिया जाए। पर उसके बाद भी 71 शिकायतें सिर्फ नियम न मानने की आईं और अगले पांच महीनों में 280 और शिकायतें जुड़ गईं। मतलब आदेश कागज पर है और वसूली आज भी सड़क पर है।
वसूली एजेंट का सबसे बड़ा हथियार पैसा नहीं, बल्कि शर्म है। भारतीय समाज में कर्ज को पाप समझा जाता है। इसलिए वह कर्जदार को फोन नहीं करता, वह उसके आत्मसम्मान को फोन करता है। वह पत्नी को बताता है, तुम्हारा पति कर्ज नहीं चुका रहा। वह पड़ोसी को बताता है कि देखो, यह आदमी चोर है। वह दफ्तर में फोन करके कहता है कि आपका कर्मचारी फ्रॉड है। आदमी कर्ज से नहीं टूटता, वह बेइज्जती से टूट जाता है। मध्यप्रदेश के कई मामलों में देखा गया है कि मूल कर्ज दस या बीस हजार था, पर ब्याज और पेनल्टी जोड़कर उसे चार गुना यानी 400 प्रतिशत तक बढ़ा दिया गया और फिर उसी बढ़े हुए कर्ज के लिए धमकी दी गई। यह वसूली नहीं है, यह मानसिक प्रताड़ना है और कई बार यही प्रताड़ना लोगों को गलत कदम उठाने पर मजबूर कर देती है।
हमने वसूली आउटसोर्स कर दी है। एजेंसी कहती है कि हमें टारगेट दिया गया है और बीच में कर्जदार फंस जाता है। जब शिकायत होती है तो बैंक कहता है कि एजेंसी ने किया। एजेंसी कहती है कि लड़का नया था और मामला खत्म। आरबीआई ने साफ कहा है कि आउटसोर्स करने के बाद भी जिम्मेदारी बैंक की ही रहेगी। यदि एजेंट ने गाली दी है तो गाली बैंक ने दी है। यदि एजेंट ने रात में फोन किया है तो फोन बैंक ने किया है। पर मध्यप्रदेश में इस सिद्धांत का पालन नहीं हो रहा। इसीलिए लोग सीधे आरबीआई के पास जा रहे हैं।
डरने की जरूरत नहीं है। आरबीआई ने इसके लिए तीन आसान रास्ते बनाए हैं - ऑनलाइन पोर्टल पर जाकर, टोल-फ्री नंबर 14448 पर कॉल करके और लिखित शिकायत भेजकर। सबसे पहले अपने बैंक के नोडल अधिकारी को लिखित में शिकायत दें। 30 दिन में जवाब न आए या जवाब से संतुष्टि न हो तो आप सीधे लोकपाल के पास जा सकते हैं। यदि आपने पहले ही बैंक में शिकायत कर रखी है तो आप सीधे लोकपाल योजना 2021 के तहत जा सकते हैं। यह अधिकार हर कर्जदार का है।
कर्ज लेना कोई अपराध नहीं है। किस्त चूकना भी अपराध नहीं है। यह एक अनुबंध का उल्लंघन है, जिसका समाधान कानून से होगा, धमकी से नहीं। कर्ज का बाजार भरोसे से चलेगा, धमकी से नहीं। मध्यप्रदेश में वसूली एजेंटों का जो गुंडाराज दिख रहा है, वह केवल कुछ लोगों की बदमाशी नहीं है। वह एक पूरी सोच का नतीजा है, जिसमें कर्जदार को ग्राहक नहीं, बल्कि अपराधी समझा जाता है। जब तक यह सोच नहीं बदलेगी, तब तक शिकायतें दोगुनी होती रहेंगी।
बैंकों को समझना होगा कि मध्यप्रदेश कृषि प्रधान प्रदेश है। यहां आय अनियमित है। कभी फसल खराब तो कभी बाजार मंदा। ऐसे में सख्ती से नहीं, बल्कि समझदारी से वसूली होगी और कर्जदार को भी समझना होगा कि चुप रहना समाधान नहीं है। जागरूकता ही बचाव है, क्योंकि जब तक आप शिकायत नहीं करेंगे, तब तक सिस्टम नहीं सुधरेगा और जब तक सिस्टम नहीं सुधरेगा, तब तक कर्ज मदद नहीं, बल्कि सजा बना रहेगा।
















