वाशिंगटन, 17 सितंबर।
अमेरिका ने पहली बार स्वीकार किया है कि उसने अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर रखे हैं। वायुसेना सचिव ट्रॉय मिंक का यह छोटा-सा बयान इतिहास की बड़ी सैन्य घोषणाओं में से एक है। उन्होंने कहा कि ऑर्बिट में ऐसे हथियार हैं, जो जरूरत पड़ने पर अमेरिकी सैनिकों को दुश्मन के हमले से बचा सकते हैं। किस तरह के हथियार हैं, कितने हैं और कब भेजे गए, यह नहीं बताया गया। यही चुप्पी सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि महाशक्ति की ऐसी घोषणा दुनिया में प्रतिस्पर्धा बढ़ाती है।
पहला गंभीर परिणाम संधियों की मौत है। 1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी में तय हुआ था कि अंतरिक्ष किसी एक का नहीं, सबका है और वहां सामूहिक विनाश के हथियार नहीं रखे जाएंगे। अमेरिका ने तकनीकी रूप से संधि नहीं toड़ी है। उसने परमाणु हथियार की बात नहीं की, रक्षात्मक हथियार की बात की। यही सबसे खतरनाक कानूनी छेद है। कल रूस कहेगा हमारे किलर सैटेलाइट भी रक्षात्मक हैं, चीन कहेगा हमारे जैमर सैनिकों की सुरक्षा के लिए हैं। भारत, फ्रांस और इजराइल भी यही कहेंगे। नतीजा - अंतरिक्ष में हथियारों की बाढ़।
दूसरा गंभीर परिणाम केसलर सिंड्रोम यानी सभ्यता का ब्लैकआउट है। आज लोअर ऑर्बिट में करीब 8,000 सक्रिय सैटेलाइट हैं। बैंक ट्रांजैक्शन, यूपीआई, जीपीएस, हवाई जहाज, मौसम विभाग और फौज का कम्युनिकेशन इन पर निर्भर है। किसी हथियार ने एक सैटेलाइट को मारा और वह टूटकर हजारों टुकड़ों में बंट गया तो ये दूसरे सैटेलाइट से टकरा सकते हैं। फिर चेन रिएक्शन शुरू हो सकता है। पूरी लोअर ऑर्बिट मलबे का कबाड़खाना बन सकती है। जीपीएस बंद, इंटरनेट ठप और मौसम की भविष्यवाणी खत्म हो सकती है। यह पूरी मानवता की हार होगी।
बेतहाशा प्रतिस्पर्धा अर्थव्यवस्थाओं पर भी भारी पड़ेगी। अंतरिक्ष हथियारों को ऑर्बिट में बनाए रखना और उनकी निगरानी करना महंगा खेल है। अमेरिका के बाद चीन अपना बजट बढ़ाएगा और रूस भी अंतरिक्ष हथियारों पर पैसा लगाएगा। भारत जैसे विकासशील देशों पर भी दबाव आएगा कि वे स्पेस डिफेंस बजट बढ़ाएं। स्कूल, अस्पताल और जलवायु परिवर्तन पर लगने वाला पैसा अंतरिक्ष में बारूद बनकर जलेगा। यह शीत युद्ध से भी बड़ी होड़ बन सकती है, क्योंकि अंतरिक्ष के हथियार अदृश्य हैं।
सबसे डरावना पहलू यह है कि अंतरिक्ष युद्ध में इंसान का नियंत्रण कम हो सकता है। ऑर्बिट में सब कुछ सेकंडों में होता है। एंटी-सैटेलाइट हथियार के हमले में किसी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के पास सोचने का पर्याप्त वक्त नहीं होगा। निर्णय एआई और स्वचालित सिस्टम ले सकते हैं। एक सैटेलाइट ने दूसरे की गतिविधि को खतरा समझा, जैमर सक्रिय हुआ और जवाबी कार्रवाई शुरू हो गई तो जमीन पर बैठे जनरलों को पता चलने से पहले युद्ध शुरू हो सकता है। अंतरिक्ष की छोटी-सी चिंगारी जमीन पर परमाणु युद्ध में बदल सकती है।
अमेरिका के कबूलनामे के बाद भारत के पास रास्ते हैं - या तो इस दौड़ में शामिल हो जाए या दुनिया को रोकने के लिए नई संधि की अगुवाई करे। भारत को सुरक्षा पर काम करना होगा। नहीं तो जिस दिन युद्ध हुआ, उस दिन हम अंधे हो जाएंगे। अमेरिका ने असुरक्षा बढ़ा दी है।















