भारत, 17 सितंबर।
बाजार जाइए तो समझ आएगा कि महंगाई क्या होती है। सरकारी फाइल में यह सिर्फ 4.82% है, पर घर की रसोई में यह 100% है। आलू-प्याज समेत कई सब्जियों के दाम बढ़ने से अगस्त में फुटकर महंगाई ने फिर उछाल मारा है। यह लगातार आठवां महीना है, जब खुदरा महंगाई बढ़ी है। अगस्त में यह बढ़कर 4.82% हो गई, जबकि जुलाई में 4.45% थी। सरकार ने 14 सितंबर को जो आंकड़े जारी किए हैं, उनके अनुसार खाने-पीने की चीजों की महंगाई तो 5.95% पर पहुंच गई है। रिजर्व बैंक का लक्ष्य 4% है, पर यह लगातार तीसरा महीना है, जब महंगाई उसके कम्फर्ट जोन से बाहर है।
4.82% को हल्के में मत लीजिए। यह आपकी सैलरी खा रहा है। महंगाई कंट्रोल में है, पर गृहिणी कहती है बजट बिगड़ गया है। यही फर्क है। 4.82% का मतलब है कि पिछले साल जो सामान 100 रुपये में आता था, वह अब 104.82 रुपये में आ रहा है। सुनने में छोटा लगता है, पर जब यही 5% हर महीने आपकी बचत पर लगता है तो साल भर में आपकी 60% सेविंग खत्म हो जाती है। खाने-पीने की महंगाई 5.95% है, यानी जिंदा रहने की लागत करीब 6% महंगी हो गई है। सैलरी 6% नहीं बढ़ी, पर जीने का खर्च 6% बढ़ गया। यही तो महंगाई की मार है।
रसोई का गणित बिगड़ गया है। टमाटर 100, तेल 200, दाल 250। पहले मध्यम वर्ग की रसोई में रविवार को पनीर बनता था, अब रविवार को भी आलू बनता है। जो टमाटर पिछले महीने 40 रुपये था, वह अब 90 रुपये है। प्याज 50 पार है, लहसुन 300 रुपये किलो, सरसों का तेल 200 रुपये लीटर और अच्छी अरहर की दाल 200 से 250 रुपये किलो है। 1,000 रुपये का नोट लेकर सब्जी मंडी जाओ तो थैला आधा भरता है। पहले 1,000 में हफ्ते भर की सब्जी आती थी, अब तीन दिन में खत्म हो जाती है। और यह सिर्फ सब्जी नहीं है। साबुन, शैम्पू, बिस्कुट, दूध, दही, सबके दाम 10 से 15% बढ़े हैं। कंपनियों ने नया खेल निकाला है - दाम वही, वजन कम। 10 रुपये वाला पैकेट अब 80 ग्राम का रह गया है। इसे श्रिंकफ्लेशन कहते हैं, पर आम आदमी इसे ठगी कहता है।
यदि एक महीने महंगाई बढ़े तो कह सकते हैं कि बारिश से फसल खराब हुई। दो महीने बढ़े तो कह सकते हैं कि सप्लाई चेन टूटी। पर जब लगातार आठ महीने महंगाई बढ़े तो समझिए कि बीमारी गहरी है। यह बीमारी भंडारण की कमी की है। प्याज सड़ जाता है, फिर महंगा होता है। यह बीमारी बिचौलियों की है। किसान को आलू के 12 रुपये मिलते हैं, आप 40 में खरीदते हैं। बीच के 28 रुपये कौन खा गया? यह बीमारी नीतियों की है, जहां उत्पादन तो बढ़ रहा है, पर वह गोदाम तक नहीं पहुंच पा रहा।
लगातार तीसरे महीने आरबीआई के 4% के लक्ष्य से ऊपर रहना यह बताता है कि ब्याज दर बढ़ाने से भी महंगाई नहीं रुक रही, क्योंकि यह महंगाई मांग से नहीं, लूट से आ रही है।
पिस रहा है मध्यम वर्ग - न गरीब की लिस्ट में, न अमीर की शान में। इस महंगाई का सबसे बड़ा शिकार कौन है? गरीब नहीं। गरीब के लिए सरकार के पास मुफ्त अनाज, सब्सिडी और योजनाएं हैं। अमीर पर असर नहीं होता। 40 रुपये की जगह 80 रुपये किलो आलू खरीदने से उसकी सेहत पर नहीं, स्टेटस पर भी असर नहीं पड़ता।
पिस रहा है मध्यम वर्ग। वह आदमी जो 30 हजार से 60 हजार कमाता है, जिसकी सैलरी साल में 5% बढ़ती है, पर खर्च 10% बढ़ जाता है। वह न अपनी तकलीफ किसी को बता पाता है, न सरकार से मदद मांग पाता है। वह चुपचाप अपना जीवन स्तर गिरा लेता है। पहले बच्चे को दो ट्यूशन दिलाता था, अब एक ही दिलाता है। पहले साल में दो बार बाहर घूमने जाता था, अब एक बार भी नहीं। पहले महीने में दो बार रेस्टोरेंट जाता था, अब स्विगी पर भी कूपन ढूंढता है। मध्यम वर्ग की यही खामोशी देश के लिए खतरनाक है, क्योंकि यही वर्ग देश की अर्थव्यवस्था चलाता है। जब यही खर्च करना बंद कर देगा तो बाजार बैठ जाएगा।
रिजर्व बैंक का लक्ष्य महंगाई को 4% पर रखना है। अब महंगाई 4.82% है तो आरबीआई पर दबाव है कि वह ब्याज दरें बढ़ाए। ब्याज दरें बढ़ीं तो होम लोन महंगा होगा। जिस मध्यम वर्ग ने 40 लाख का फ्लैट 30 हजार की ईएमआई पर लिया है, उसकी ईएमआई 33 हजार हो जाएगी। यानी एक तरफ सब्जी महंगी, दूसरी तरफ कर्ज महंगा। आम आदमी जाए तो कहां जाए?
सरकार को अब यह कहना बंद करना होगा कि महंगाई कंट्रोल में है। कंट्रोल में होती तो थाली खाली न होती। मंडियों में लूट बंद करो। किसान से उपभोक्ता तक का सफर 30 किलोमीटर का है, पर दाम तीन गुना हो जाता है। इस बिचौलिए नेटवर्क को तोड़ना होगा। कोल्ड स्टोरेज बढ़ाओ। हर जिले में प्याज, आलू और टमाटर के लिए स्टोरेज बनाओ, ताकि सड़ने से बचाया जा सके। मध्यम वर्ग को राहत दो। केवल बीपीएल परिवार ही नहीं, वह परिवार भी मदद का हकदार है जो 50 हजार कमाता है, पर 45 हजार खर्च कर देता है।
महंगाई सिर्फ आंकड़ा नहीं है। यह भरोसा तोड़ती है। जब आदमी को लगे कि मेहनत बढ़ रही है, पर जीवन स्तर घट रहा है तो उसका सिस्टम से भरोसा उठ जाता है। 14 सितंबर के आंकड़े आ चुके हैं। 14 अक्टूबर को फिर आंकड़े आएंगे। तब तक अगर सब्जी मंडी में यही हाल रहा तो यह 4.82% पांच पार कर जाएगा और तब आम भारतीय की थाली में सिर्फ आलू ही नहीं, चिंता भी परोसी जाएगी।
















