भारत, 17 सितंबर।
यूपीआई पर टैक्स की चर्चा ने उन लोगों के चेहरे पर तनाव ला दिया है, जो अभी-अभी नगद खरीद-फरोख्त से बाहर निकले थे। यूपीआई ने भारत में भुगतान की संस्कृति बदल दी। जो आदमी कभी खुले पैसे के लिए परेशान होता था, वह अब क्यूआर कोड दिखाता है। यह बदलाव केवल सुविधा का नहीं, बल्कि भरोसे का था। लोगों को लगा कि डिजिटल लेनदेन सस्ता और सुरक्षित है। टैक्स की चर्चा से वही भरोसा हिलने लगा है। यह भरोसा आसानी से नहीं बनता।
यूपीआई भुगतान पर टैक्स लगा तो आम आदमी उसी तरफ लौट सकता है। दुकानदार सोचेगा कि ग्राहक से दो हजार रुपये का सामान लिया तो ऊपर से टैक्स क्यों दूं। वह कहेगा, भैया कैश दे दो। ग्राहक के पास कैश नहीं होगा तो उधारी होगी और विवाद बढ़ेंगे। छोटे व्यापार में यूपीआई ने जो पारदर्शिता लाई है, वह फिर धुंधली हो सकती है।
यूपीआई की सफलता में इसका आसान और कम लागत वाला होना महत्वपूर्ण रहा है। इसने भुगतान को सरल बनाया है। यदि इस पर शुल्क या टैक्स का बोझ आया तो छोटे व्यापारी प्रभावित होंगे। वे पहले ही जीएसटी और अन्य खर्चों से दबे हैं।
यूपीआई से हर लेनदेन का रिकॉर्ड बनता है। कैश में यह पारदर्शिता नहीं होती। टैक्स के डर से लोग कैश में लौटे तो पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है। आम आदमी अब जेब में ज्यादा कैश नहीं रखता। रोजमर्रा की जरूरतों का भुगतान भी यूपीआई से करता है। उसके लिए यूपीआई भुगतान के साथ हिसाब-किताब का साधन भी है।
सरकार को यूपीआई पर टैक्स संबंधी चर्चा पर स्पष्टता देनी चाहिए। डिजिटल अर्थव्यवस्था भरोसे पर चलती है। जिस कैशलेस व्यवस्था को बनाने में वर्षों लगे हैं, उसे अनिश्चितता से कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।















