सागर, 17 सितंबर।
मध्यप्रदेश के सागर में जहरीली शराब ने कई घरों के चूल्हे बुझा दिए। शिवपुरी में शराब की दुकानें दिनदहाड़े लूटी गईं। ये घटनाएं अलग जिलों की लग सकती हैं, पर इनकी जड़ एक ही है - शासन की शराब नीति की विफलता और तंत्र की कर्तव्यहीनता। जब सरकार राजस्व के लिए नीति बनाती है और नीति ही माफियाओं के लिए युद्ध का मैदान बन जाए तो समझना चाहिए कि जन के नाम पर जन की ही बलि ली जा रही है।
मुख्यमंत्री द्वारा महिलाओं के जज्बे की सराहना करना अच्छी बात है, पर इससे उन विधवाओं के आंसू नहीं पोंछे जा सकते, जिन्होंने जहरीली शराब से अपने पति खो दिए। विधि के रखवाले और सेवा की शपथ लेने वालों की नाक के नीचे जब खुलेआम संग्राम छिड़ा हो तो सराहना नहीं, जवाबदेही तय होनी चाहिए।
हर गांव में पंचायत, सचिव, सहायक सचिव, पटवारी, कोटवार, आंगनबाड़ी और शिक्षक हैं। हर थाने में बीट, सर्किल और प्रभारी हैं। हर जिले में कलेक्टर से लेकर आबकारी अधिकारी तक का अमला है। फिर भी गांव-गांव, गली-मोहल्ले और टोले में कच्ची-पक्की शराब सरेआम बिक रही है। यदि इतने पहरेदारों के बाद भी भट्टी जल रही है तो यह केवल चूक नहीं, मिलीभगत का सवाल है। यदि इतनी समीक्षाओं के बाद भी मौतें हो रही हैं तो समीक्षा केवल खानापूर्ति है।
बीते कुछ वर्षों में शासन ने शराब नीति बनाई और ठेकेदारों को एमआरपी के नाम पर बांध दिया। ऊपर से राजस्व का लक्ष्य और नीचे से मुनाफे की चाहत ने वैध और अवैध के बीच की दीवार गिरा दी। वैध दुकान से कमाई कम हुई तो अवैध कारोबार का सहारा लिया गया। जहरीली शराब ने गरीब की जान ले ली। दूसरी ओर शराब माफियाओं के बीच अपना वजूद बचाने की लड़ाई शुरू हो गई। अधिक धन की लालसा में कारोबारी अदावत तेज हो गई। शिवपुरी में दुकानें लूटी गईं तो यह केवल लूट नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का संकेत है।
फिलहाल सागर में मौतों पर विलाप चल रहा है और शिवपुरी में शराब बिक्री को लेकर आक्रोश पनप रहा है। पुलिस ने कुछ लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। पर असली जवाबदेही उन पर होनी चाहिए, जिनकी कर्तव्य-विमुखता के कारण ये हालात बने हैं। उस कोटवार पर कार्रवाई क्यों नहीं, जिसने सूचना नहीं दी? उस पटवारी पर कार्रवाई क्यों नहीं, जिसने आंखें मूंद लीं? उस बीट प्रभारी की जवाबदेही क्यों नहीं, जिसके क्षेत्र में जहरीली शराब बनी? सबसे बड़ा सवाल उस नीति पर है, जो राजस्व के लिए जनस्वास्थ्य को दांव पर लगा देती है।
शराब नीति का आधार राजस्व नहीं, जनस्वास्थ्य होना चाहिए। जरूरत है कि हर गांव में तैनात कर्मचारियों की जवाबदेही तय हो और फील्ड में मौजूदगी सुनिश्चित की जाए। अवैध शराब की सूचना न देने वालों पर कार्रवाई हो और एमआरपी के अव्यावहारिक बंधनों को हटाकर पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए। विलाप के साथ हिसाब भी जरूरी है, नहीं तो कल फिर किसी सागर में चिताएं जलेंगी और किसी शिवपुरी में दुकानें लुटेंगी।















