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संपादकीय
18 Sep, 2026

अमेरिका का फीस वाला गेट और भारतीय सपनों पर ताला

अमेरिका में विदेशी छात्रों के लिए ओपीटी की फीस एक लाख डॉलर तक करने के प्रस्ताव से भारतीय विद्यार्थियों के रोजगार, शिक्षा ऋण और आगे के करियर पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

अमेरिका, 18 सितंबर।

अमेरिका में पढ़ना अब केवल पढ़ना नहीं रहा, बल्कि एक महंगा सौदा बनता जा रहा है। ट्रंप प्रशासन ने विदेशी छात्रों के लिए ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग यानी ओपीटी की फीस को करीब 40 हजार रुपये से बढ़ाकर एक लाख डॉलर तक करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। खबर सुनने में यह एक प्रशासनिक फेरबदल लग सकती है, लेकिन इसका सीधा असर अमेरिका में पढ़ रहे लाखों विदेशी छात्रों, खासकर भारतीयों पर पड़ सकता है। अमेरिका में इस समय बड़ी संख्या में विदेशी छात्र हैं, जिनमें भारतीय छात्रों की हिस्सेदारी महत्वपूर्ण है। इनमें अधिकांश विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित यानी एसटीईएम क्षेत्रों से जुड़े हैं और ओपीटी उनके अमेरिकी करियर का पहला दरवाजा है।

ओपीटी को समझना जरूरी है। अमेरिका में एफ-1 वीजा पर पढ़ने वाले छात्र को पढ़ाई पूरी करने के बाद 12 महीने तक अपने विषय से संबंधित क्षेत्र में काम करने की अनुमति मिलती है। एसटीईएम छात्रों को 24 महीने का अतिरिक्त विस्तार मिलता है। यह अवधि छात्र के लिए केवल नौकरी नहीं, बल्कि आगे एच-1बी तक पहुंचने का पुल भी है। इसी पुल पर अब एक लाख डॉलर का टोल लगाने की तैयारी है। यह फीस छात्र से नहीं, नियोक्ता से वसूली जाएगी, लेकिन इसका बोझ अंततः छात्र पर ही पड़ सकता है। कोई भी अमेरिकी कंपनी एक नए विदेशी स्नातक के लिए इतनी बड़ी अतिरिक्त लागत क्यों उठाएगी, जब उसके पास घरेलू प्रतिभा का विकल्प मौजूद है?

ट्रंप प्रशासन की यह नीति उसकी पुरानी लाइन ‘अमेरिकन जॉब्स फॉर अमेरिकन्स’ से जुड़ी है। तर्क यह दिया जा रहा है कि ओपीटी सस्ते विदेशी श्रम का जरिया बन गया है और इससे अमेरिकी युवाओं के अवसर प्रभावित हो रहे हैं। इसलिए इसकी लागत बढ़ाकर इसे हतोत्साहित किया जाए। हालांकि प्रस्ताव को लागू करने से पहले आपत्तियां और सुझाव मांगे जाने की प्रक्रिया होगी। इसके बावजूद संदेश स्पष्ट है कि विदेशी छात्रों के लिए अमेरिका में पढ़ाई के बाद काम करने का रास्ता महंगा और अनिश्चित बनाया जा रहा है।

भारतीय छात्रों पर इसका पहला असर नौकरी के अवसरों पर पड़ सकता है। बड़ी कंपनियां शायद यह अतिरिक्त लागत उठा लें, लेकिन अधिकांश छात्र छोटी और मध्यम आकार की कंपनियों, नवोदित कंपनियों या मध्यम स्तर के संस्थानों से अपने करियर की शुरुआत करते हैं। वहां इतनी बड़ी फीस रोजगार के फैसले को प्रभावित कर सकती है।

दूसरा संकट शिक्षा ऋण का है। अमेरिका जाने वाले अनेक भारतीय छात्र भारी शिक्षा ऋण लेकर पढ़ाई करते हैं और उनकी योजना ओपीटी के दौरान काम करके कर्ज चुकाने की होती है। यदि नौकरी के अवसर घटे तो इसका असर परिवारों की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ेगा। पहले से मौजूद वीजा अनिश्चितता के बीच ऐसी नीति छात्रों का तनाव बढ़ा सकती है।

इसके दूरगामी परिणाम अमेरिका तक सीमित नहीं होंगे। अमेरिकी उच्च शिक्षा और तकनीकी क्षेत्र लंबे समय से विदेशी प्रतिभाओं से लाभान्वित होते रहे हैं। यदि अमेरिका में अवसर महंगे और कठिन होंगे तो कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भारतीय छात्रों के लिए अधिक आकर्षक विकल्प बन सकते हैं। इससे वैश्विक शिक्षा बाजार का संतुलन बदल सकता है।

भारत के लिए इसमें चुनौती के साथ अवसर भी है। जो विद्यार्थी वापस लौटेंगे, वे उच्च कौशल और वैश्विक अनुभव लेकर आएंगे। यदि भारत उन्हें बेहतर शोध संस्थान, नवोदित उद्योगों के अवसर, प्रतिस्पर्धी वेतन और मजबूत औद्योगिक माहौल दे सके तो यह प्रतिभा पलायन को प्रतिभा वापसी में बदलने का अवसर होगा। लेकिन इसके लिए केवल अपील नहीं, ठोस नीतियों की जरूरत होगी।

अमेरिका को भी समझना होगा कि विदेशी छात्र केवल नौकरी मांगने वाले नहीं हैं। वे विश्वविद्यालयों को फीस देते हैं, स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान करते हैं और आगे चलकर अमेरिकी कंपनियों में प्रतिभा जोड़ते हैं। शिक्षा के रास्ते पर अत्यधिक आर्थिक दीवार खड़ी करने से अमेरिका का आकर्षण प्रभावित हो सकता है। भारत सरकार को भी अपने छात्रों के हितों को कूटनीतिक स्तर पर उठाने के साथ वैकल्पिक देशों में अवसर बढ़ाने और लौटने वाली प्रतिभा के लिए बेहतर व्यवस्था तैयार करनी चाहिए।

अमेरिकी सपना कभी खुली बाहों का प्रतीक था। यदि उसी सपने के गेट पर एक लाख डॉलर का ताला लगा दिया गया, तो सपने देखने वाले रास्ता बदल सकते हैं। सवाल सिर्फ इतना है कि इस बदलाव की कीमत कौन चुकाएगा—छात्र, परिवार, भारत या खुद अमेरिका?

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