भोपाल, 19 सितंबर।
गन्ने के खेत में खड़ी फसल और फैक्ट्री में लगी मशीन के बीच का फासला कभी-कभी एक पूरे औद्योगिक सपने को लटका देता है। उत्तर प्रदेश के खड्डा में लगने वाला एक लाख लीटर रोजाना क्षमता वाला इथेनॉल प्लांट इसी फासले का नया उदाहरण बन गया है। कागजों पर सब कुछ ठीक है। तकनीकी मंजूरी मिल गई है, दस्तावेज दुरुस्त हैं, पूंजी की व्यवस्था हो गई है, पर जमीन पर शीरा नहीं है। और शीरे के बिना इथेनॉल का प्लांट केवल लोहे का ढांचा है।
गन्ने की कमी नहीं, गन्ने के बंटवारे की कमीअक्सर कहा जाता है कि गन्ने की कमी है। यह अधूरा सच है। पूरा सच यह है कि गन्ने की उपलब्धता का प्रबंधन ही सबसे बड़ी कमी है। खड्डा की शुगर मिल की कुल क्रशिंग क्षमता 45 लाख क्विंटल की है, पर 2025-26 के सीजन में उसे केवल 27 लाख क्विंटल गन्ना ही मिल सका। लगभग 40 प्रतिशत क्षमता खाली रह गई। जब मिल को ही गन्ना नहीं मिलेगा, उससे निकलने वाला शीरा कहां से आएगा? किसान गन्ना उगाता है, पर वह अपनी सुविधा से बेचता है। कभी गुड़ भट्ठे को, कभी खांडसारी को, कभी दूसरी मिल को, जो ज्यादा भाव दे दे। कभी वह फसल ही बदल लेता है, क्योंकि गन्ने का भुगतान महीनों लटकता है। ऐसे में इथेनॉल प्लांट के लिए शीरे की स्थायी आपूर्ति की गारंटी कहां से आएगी? यह सवाल केवल खड्डा का नहीं है। यह पूरे देश के इथेनॉल कार्यक्रम का सवाल है।
नीति का विरोधाभास : चीनी बनाएं या इथेनॉलसरकार एक तरफ इथेनॉल ब्लेंडिंग को 20 प्रतिशत तक ले जाना चाहती है, ताकि कच्चे तेल का आयात बिल घटे और गन्ना किसानों को अतिरिक्त आमदनी मिले। दूसरी तरफ वही सरकार चीनी के निर्यात और घरेलू स्टॉक पर नियंत्रण भी रखना चाहती है, ताकि महंगाई न बढ़े। इस दोहरे लक्ष्य में मिल मालिक फंस जाता है। यदि वह पूरा गन्ना रस या बी-हेवी शीरा इथेनॉल में लगा दे, तो चीनी का उत्पादन घटेगा। यदि चीनी बनाएगा, तो इथेनॉल के लिए शीरा नहीं बचेगा। सरकार का निर्णय कभी इथेनॉल को बढ़ावा देता है, कभी अचानक गन्ना जूस से इथेनॉल बनाने पर रोक लगा देता है। इस अनिश्चितता में कोई भी निवेशक अपना एक लाख लीटर का प्लांट कैसे चलाएगा?
2020 में जब खड्डा फैक्ट्री की पहली योजना बनी थी, तो क्षमता 60 हजार लीटर की आंकी गई थी। फिर इसे बढ़ाकर एक लाख लीटर किया गया। जिला प्रशासन, पर्यावरण विशेषज्ञ और गन्ना उत्पादकों से बातचीत भी हुई, पर बातचीत में यह नहीं पूछा गया कि गन्ना आएगा कहां से।
खड्डा मॉडल से पूरे प्रदेश को सबकउत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक राज्य है और सबसे बड़ा इथेनॉल आपूर्तिकर्ता भी। यहां हर शुगर मिल के साथ इथेनॉल प्लांट को टैग किया जा रहा है, पर खड्डा की घटना बताती है कि बिना फीडस्टॉक सिक्योरिटी के यह टैगिंग केवल कागजी खानापूर्ति है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में पिछले दो सालों में अल नीनो के कारण गन्ना उत्पादन में भारी गिरावट आई थी। सितंबर में वर्षा कम होने की संभावना बनी हुई है। शकर उद्योग के पास स्टॉक पहले से ही कई वर्षों के न्यूनतम स्तर पर है। ऐसे में यदि उत्तर प्रदेश में भी गन्ना कम पड़ा, तो इथेनॉल प्लांट सबसे पहले बंद होंगे, क्योंकि सरकार प्राथमिकता में चीनी को ही रखेगी।
गन्ने का रकबा बढ़ाने के साथ-साथ उसकी उत्पादकता बढ़ाना। आज भी उत्तर प्रदेश में गन्ने की औसत पैदावार तमिलनाडु या महाराष्ट्र के मुकाबले कम है। नई किस्में, बेहतर बीज और ड्रिप सिंचाई से ही अधिक गन्ना पैदा हो सकता है।
भुगतान प्रणाली को सुधारनायदि किसान को गन्ने का भुगतान सात दिन में मिल जाए, तो वह गुड़ भट्ठे की ओर नहीं भागेगा। वह मिल को ही गन्ना देगा और मिल के पास पर्याप्त शीरा होगा।
फीडस्टॉक का विविधीकरण जरूरी है। केवल गन्ने पर निर्भर इथेनॉल कार्यक्रम कभी भी सुरक्षित नहीं रहेगा। मक्का, धान का पुआल और खराब अनाज से भी इथेनॉल बनना चाहिए, ताकि एक फसल फेल हो तो दूसरा विकल्प मौजूद रहे। सरकार ने मक्का से इथेनॉल को बढ़ावा देना शुरू किया है, पर उसकी भी खरीद व्यवस्था अभी कमजोर है।
समाधान है स्पष्ट और दीर्घकालीन नीतिनिवेशक को पता होना चाहिए कि अगले पांच साल तक गन्ना जूस, बी-हेवी और सी-हेवी शीरे पर सरकार का रुख क्या रहेगा। बार-बार पॉलिसी बदलने से इथेनॉल प्लांट बैंक के लिए एनपीए बन जाते हैं और किसान के लिए भरोसे की कमी का कारण।
इथेनॉल केवल ईंधन नहीं, किसान की आय का इंजन है। गन्ने की कमी से जूझते इथेनॉल प्लांट की कहानी केवल एक फैक्ट्री के लेट होने की कहानी नहीं है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा की कहानी है। हम हर साल लाखों करोड़ रुपये का कच्चा तेल आयात करते हैं। यदि इथेनॉल कार्यक्रम सफल होता है, तो यह पैसा देश के किसान के पास जाएगा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में जाएगा। पर इसके लिए गन्ने को केवल एक फसल नहीं, एक औद्योगिक कच्चा माल समझना होगा। उसके खरीद, भंडारण और भुगतान को उतनी ही गंभीरता से लेना होगा, जितनी गंभीरता से हम कच्चे तेल की पाइपलाइन को लेते हैं।
खड्डा का प्लांट आज इंतजार कर रहा है। गन्ने का इंतजार, नीति की स्पष्टता का इंतजार और सबसे ज्यादा भरोसे का इंतजार। यदि यह इंतजार लंबा खिंचा, तो इथेनॉल का सपना शीरे की तरह ही गाढ़ा और चिपचिपा होकर रह जाएगा और मशीनें फिर से जंग खाने लगेंगी।
















