भोपाल, 19 सितंबर।
वायुसेना की ताकत केवल लड़ाकू विमानों की गिनती से नहीं मापी जाती। वायुसेना की ताकत इस बात से मापी जाती है कि संकट के समय वह कितनी जल्दी, कितनी दूर और कितनी आत्मनिर्भरता के साथ दुश्मन के हौसले को तोड़ सकती है। इसी आत्मनिर्भरता की सबसे बड़ी कुंजी है ऐतिहासिक स्वदेशी आत्मरक्षा उपकरणों का निर्माण। जब कोई देश अपने रक्षा उपकरण बाहर से खरीदता है, तो वह केवल लोहे का सौदा नहीं करता, वह अपनी विदेश नीति को भी गिरवी रखता है। कल को युद्ध छिड़े और सप्लायर देश ने पुर्जे देने से मना कर दिया, तो रनवे पर खड़े जहाज केवल शोपीस बन जाते हैं। भारत ने यह दर्द कई बार सहा है। इसी दर्द से निकला है आत्मनिर्भर भारत का संकल्प और इसी संकल्प का सबसे चमकता हुआ चेहरा है भारतीय वायुसेना के लिए स्वदेशी उपकरणों का निर्माण।
स्वदेशी निर्माण का अर्थ केवल मेक इन इंडिया नहीं है। स्वदेशी का अर्थ केवल भारत में जोड़ना नहीं है। स्वदेशी का अर्थ है भारत में सोचना, भारत में डिजाइन करना, भारत में धातु को गलाना, भारत में सॉफ्टवेयर लिखना और भारत में भविष्य की चुनौतियों के लिए उसे अपग्रेड करना। तेजस लड़ाकू विमान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। तेजस केवल एक विमान नहीं है, वह चार दशकों की तपस्या है। उसके साथ हजारों इंजीनियरों की नौकरियां जुड़ी हैं, सैकड़ों छोटी-बड़ी कंपनियों का इकोसिस्टम जुड़ा है और एक भरोसा जुड़ा है कि हम भी चौथी-पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान बना सकते हैं। तेजस के बाद अब एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए, स्टेल्थ मानव रहित प्लेटफॉर्म, स्वदेशी एस्ट्रा मिसाइल, ब्रह्मोस का हवाई संस्करण, नेत्रा जैसे एयरबोर्न वार्निंग सिस्टम और स्वदेशी रडारों की पूरी श्रृंखला—ये सब केवल हथियार नहीं हैं, ये भारत की तकनीकी संप्रभुता की घोषणा हैं।
वायुसेना की ताकत कैसे बढ़ती है, स्वदेशी से? पहली ताकत है उपलब्धता की। जब उपकरण अपना होता है, तो उसकी मेंटेनेंस अपनी होती है, स्पेयर पार्ट्स अपने गोदाम में होते हैं। युद्ध के समय हमें किसी दूसरे देश के टाइम जोन में फोन नहीं करना पड़ता। गोपनीयता की बात करें तो आयातित विमान में कोड किसी और का होता है। उसका रडार क्या देख सकता है और क्या नहीं, यह कई बार सप्लायर देश तय करता है। स्वदेशी सिस्टम में सोर्स कोड हमारा होता है। हम अपनी जरूरत के हिसाब से उसे बदल सकते हैं और दुश्मन की नई तकनीक के हिसाब से उसे अपडेट कर सकते हैं। संख्या की बात करें तो विदेशी विमान महंगा होता है। एक स्क्वाड्रन खरीदने में ही बजट हिल जाता है। स्वदेशी विमान सस्ता पड़ता है और सस्ता होने के कारण हम ज्यादा संख्या में विमान रख सकते हैं। हवाई युद्ध में संख्या ही अंतिम विजेता तय करती है। मनोबल की बात करें तो जब पायलट को पता होता है कि उसकी पीठ के पीछे पूरा देश खड़ा है, उसके विमान का नट-बोल्ट उसके अपने शहर में बना है, तो उसका आत्मविश्वास दोगुना हो जाता है। यह मनोबल किसी भी मिसाइल से ज्यादा घातक होता है।
आर्थिक विकास की राहें कैसे खुलती हैं, अब आते हैं इस विषय के दूसरे हिस्से पर, जो अक्सर अनदेखा रह जाता है। रक्षा निर्माण केवल सुरक्षा का खर्च नहीं है, यह अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा निवेश है। एक लड़ाकू विमान जब बनता है, तो उसके साथ दस हजार तरह के उद्योग चलते हैं। एल्युमिनियम और टाइटेनियम की धातु बनती है, एवियोनिक्स के लिए सेमीकंडक्टर बनते हैं, कॉम्पोजिट मटेरियल के लिए कार्बन फाइबर बनता है, इंजन के लिए विशेष स्टील बनता है और सॉफ्टवेयर के लिए हजारों कोडर्स को काम मिलता है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के आंकड़ों को देखें तो एक तेजस के निर्माण में लगभग पांच सौ एमएसएमई कंपनियां सीधे जुड़ी हैं और हजारों कंपनियां अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हैं। नासिक, बेंगलुरु, हैदराबाद, लखनऊ, कोरापुट जैसी जगहों पर एक पूरा रक्षा कॉरिडोर विकसित हो रहा है, जहां वेल्डर से लेकर रोबोटिक्स इंजीनियर तक को रोजगार मिल रहा है।
यह रोजगार केवल नौकरी नहीं देता, यह स्किल देता है। जो युवा आज लड़ाकू विमान के विंग पर काम कर रहा है, कल वही युवा नागरिक विमान के लिए भी काम कर सकता है और परसों वही युवा अपना खुद का स्टार्टअप शुरू कर सकता है। इस तरह रक्षा निर्माण से टेक्नोलॉजी का ट्रिकल डाउन होता है, जो पूरे देश की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को बढ़ाता है।
इतिहास से सबक और भविष्य का रास्ता—इतिहास गवाह है, जिन देशों ने रक्षा को केवल खरीदने की चीज समझा, वे हमेशा दबाव में रहे और जिन देशों ने रक्षा को बनाने की चीज समझा, वे महाशक्ति बन गए। अमेरिका की जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा रक्षा अनुसंधान से निकली टेक्नोलॉजी से आता है। जीपीएस, इंटरनेट, जेट इंजन सब पहले सेना के लिए बने थे, बाद में उन्होंने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था बदल दी। भारत के पास भी यही अवसर है। अभी भारत रक्षा उपकरणों का बड़ा आयातक है। यदि हम स्वदेशी उपकरणों का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करते हैं, तो दोहरा लाभ होगा—आयात बिल घटेगा और निर्यात का नया द्वार खुलेगा। फिलिपींस को ब्रह्मोस बेचना, अर्जेंटीना को तेजस में रुचि दिखाना, यह केवल शुरुआत है। भविष्य में भारत हल्के लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों और ड्रोन का एक बड़ा निर्यातक बन सकता है और रक्षा निर्यात से मिलने वाला हर डॉलर देश के भीतर रोजगार और विकास बनकर लौटेगा।
इसलिए वायुसेना की ताकत और आर्थिक विकास को अलग-अलग करके नहीं देखना चाहिए। ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब हम स्वदेशी इंजन बनाते हैं, तो हम केवल विमान को ताकत नहीं देते, हम अपने युवा को काम देते हैं, अपने कारखाने को ऑर्डर देते हैं, अपने विश्वविद्यालय को शोध का विषय देते हैं। आकाश में उड़ता हुआ स्वदेशी विमान केवल दुश्मन को चेतावनी नहीं देता, वह नीचे खड़े किसान के बेटे को भी कहता है कि देखो, तुम्हारे देश ने यह बनाया है, तुम भी कुछ बना सकते हो। यही वह मनोवैज्ञानिक बदलाव है, जो किसी भी राष्ट्र को गरीब से समृद्ध बनाता है। रक्षा का स्वदेशीकरण केवल सेना का आधुनिकीकरण नहीं है, यह राष्ट्र के आत्मविश्वास का आधुनिकीकरण है। और जब आत्मविश्वास स्वदेशी हो जाता है, तो आर्थिक विकास अपने आप उसके पीछे चला आता है।
















