भोपाल, 19 सितंबर।
चयनित शिक्षकों का मामला अब केवल नियुक्ति का मामला नहीं रहा, यह व्यवस्था की संवेदनशीलता और प्रशासनिक इच्छाशक्ति का परीक्षण बन गया है। जब चयनित शिक्षक अपनी पदस्थापना के लिए खून से चिट्ठी लिखने को मजबूर होते हैं, तो यह घटना चेतावनी बन जाती है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में गंभीर जड़ता आ गई है।
मध्यप्रदेश में शिक्षक चयन परीक्षा एक लंबी प्रक्रिया से गुजरती है। विज्ञापन निकलता है, परीक्षा होती है, परिणाम आता है, सत्यापन होता है, सूची जारी होती है और फिर इंतजार शुरू होता है। यह इंतजार महीनों से सालों में बदल जाता है। चयनित शिक्षक के हाथ में नियुक्ति पत्र नहीं, बल्कि केवल चयन सूची का एक कागज होता है। वह न पूरी तरह बेरोजगार रहता है, न पूरी तरह रोजगार में आता है। उसकी स्थिति त्रिशंकु जैसी हो जाती है।
सरकार की ओर से तर्क दिए जाते हैं—कभी बजट का, कभी पदों के युक्तियुक्तकरण का, कभी न्यायालयीन प्रकरणों का। ये तर्क प्रशासनिक फाइलों में सही लग सकते हैं, पर जमीन पर खड़े उस युवा के लिए इनका कोई अर्थ नहीं है, जिसने वर्षों मेहनत करके परीक्षा पास की है।
खून से चिट्ठी लिखना कोई सामान्य विरोध नहीं है। यह हताशा की अंतिम अभिव्यक्ति है। जब ज्ञापन, आवेदन, निवेदन और शांतिपूर्ण प्रदर्शन से कोई सुनवाई नहीं होती, तो व्यक्ति अपने शरीर को ही माध्यम बना लेता है। यह आत्मपीड़न के माध्यम से सत्ता का ध्यान खींचने की कोशिश है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है। शिक्षक वह वर्ग है, जो समाज को धैर्य और विवेक सिखाता है। यदि वही वर्ग अपनी बात कहने के लिए खून का उपयोग करने लगे, तो यह मानना पड़ेगा कि संवाद के सामान्य रास्ते बंद हो चुके हैं।
प्रदेश में हजारों स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, एकल शिक्षकीय शालाएं हैं और दूसरी तरफ चयनित शिक्षक पदस्थापना के लिए भटक रहे हैं। यह विरोधाभास बताता है कि समस्या पदों की नहीं, प्रबंधन की है। चयनित शिक्षकों को स्कूल चाहिए और स्कूलों को शिक्षक चाहिए। उम्मीद है कि खून की चिट्ठी पढ़ने के बाद वह हस्ताक्षर स्याही से ही कर दिया जाएगा।















